परशुरामजी को पराजय की अनुभूति क्यों नहीं हुई ? हम स्वयं से थोड़े ही हारते हैं । जब कोई दूसरा हमें हरा देता है तब हमें हार की अनुभूति होती है । एक बड़ा प्रसिद्ध वाक्य है - अन्यत्रं जयमिच्छेत पुत्रादिच्छेत्पराजयम् - दूसरों से जीतने की इच्छा रखे, पर अपने पुत्र से हार जाय तो बड़ी प्रसन्नता होती है । पुत्र अगर पिता की अपेक्षा अधिक पढ़ ले, अधिक ज्ञान प्राप्त कर ले, तो पिता को बड़ा सन्तोष होता है । क्यों होता है ? अपनत्व के कारण । परायेपन की अनुभूति रही, तो वहाँ भी हार का बोध होगा और विद्वेष उत्पन्न होगा । परशुरामजी का व्यक्तित्व जिस अहं से उबर नहीं पा रहा था, उसे भगवान राम ने उबारा । और ममता ? वह भी उसी अहं से जुड़ी हुई थी, जिससे उबारा लक्ष्मणजी ने ।
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