Thursday, 29 September 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

लक्ष्मणजी द्वारा परशुरामजी को कहे गये एक-एक शब्द बड़े सार्थक हैं । एहि, धनु, ममता, केहि हेतू - इन चार शब्दों की अर्थ-गरिमा पर विचार करें । लक्ष्मणजी कहते हैं - महाराज ! पहली बात तो यह है कि ज्ञान की दृष्टि से तो आपमें ममता होनी ही नहीं चाहिए । और अगर यह मान भी लिया जाय कि व्यवहार की दृष्टि से कुछ-न-कुछ ममता तो रखनी ही पड़ती है, तो वह अधिकार भी आपको नहीं है । क्योकि न तो आपने विवाह किया, न गृहस्थ हुए और न सत्ता ही स्वीकार की । आप तो बाल-ब्रह्मचारी, सर्वत्यागी महात्मा हैं । जिस व्यक्ति के जीवन में इतना त्याग हो उसमें ममता का न होना ही स्वाभाविक लगता है और आपके चरित्र के लिए भी यह अनुकूल होता । लेकिन यह बड़े दुर्भाग्य की बात है कि इतना त्याग करने के बाद भी आपने अपने जीवन में ममता को रहने दिया । फिर वे व्यंग्य करते हुए बोले - और आपने ममता रखी भी तो किस पर ? 'एहि धनु पर' इस धनुष पर ? तो ममता के लिए क्या यह धनुष ही बचा था ? आप देख ही रहे हैं कि यह टूटा हुआ पड़ा है, खण्डित है अर्थात यह परिणामी, ससीम और अनित्य है । एक तो ममता होनी ही नहीं चाहिए थी और यदि आपको ममता जोड़नी ही थी तो आपके सामने खण्ड और अखण्ड दोनों थे । एक ओर तो खण्डित धनुष पड़ा है और दूसरी ओर अखण्ड ज्ञानघन श्रीराम खड़े हैं । लक्ष्मणजी का तात्पर्य यह था कि ममता करनी ही थी तो किस पर की जाय इसका विवेकपूर्ण चुनाव तो कर लेना था ।

No comments:

Post a Comment