Wednesday, 21 September 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........

भक्ति के संदर्भ में परशुरामजी के चरित्र से हमें काफी प्रेरणा मिल सकती है । परशुरामजी ने ब्रह्मचर्य के द्वारा काम को जीत लिया था और दान के द्वारा लोभ को जीत लिया था । वे महान तपस्वी, महान शास्त्रवेत्ता, महान पितृभक्त और सद्गुणों के पुंज थे । पर इतना सब होते हुए भी परशुरामजी के जीवन में शान्ति क्यों नहीं थी ? जो लोग दुष्कर्म करके दुखी हैं, उनकी बात समझ में आती है कि पाप करने पर व्यक्ति दुख पा रहा है, लेकिन अगर किसी को सत्कर्म करते हुए भी शान्ति नहीं मिल रही है, तो इसका मतलब क्या है ? परशुरामजी के जीवन में तो सत्कर्मों की पराकाष्ठा दीख पड़ती है । उन्होंने कोई छोटा-मोटा दान नहीं, पूरी पृथ्वी का दान किया था । उनका ब्रह्मचर्य भी साधारण नहीं था, वे आजन्म ब्रह्मचारी रहे । पर इतना होते हुए भी परशुरामजी को शान्ति नहीं मिली । इस महान प्रसंग की उपलब्धि यह है कि परशुरामजी को अन्ततः शान्ति मिल जाती है । उनके जीवन से हमें शान्ति का मार्ग दिखाई देता है । उनके जीवन में अशान्ति का मूल कारण क्या था ? यदि हम इस पर विचार करके देखें तो वहाँ हमें दो ही ऐसे कारण दिखाई देंगे जो परशुरामजी को दुखी और अशान्त बनाए हुए हैं । हम चाहे कितना भी सत्कर्म क्यों न करें पर जब तक ये दोनों हमारे जीवन में विद्यमान रहेंगे, तब तक हमें शान्ति नहीं मिल सकती । परशुरामजी के अन्तःकरण में ये दो भाई हैं - अहंता और ममता और उनके सामने दो भाई खड़े हैं - श्रीराम और लक्ष्मण, ये ही उन्हें सुख और शान्ति प्रदान करने वाले हैं । अहंता का समाधान है श्रीराम और ममता का श्रीलक्ष्मण । ये अहंता और ममता अर्थात मैं और मेरापन - एक दूसरे से जुड़े हुए हैं । जब तक यह अहंता और ममता नहीं मिट जाती, तब तक जीवन में सुख और शान्ति नहीं आ सकती । यही अहंता और ममता ही परशुरामजी की समस्या है ।

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