Monday, 26 September 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .........

परशुरामजी को जब राम का प्रभाव ज्ञात हुआ, प्रेम मानो ह्रदय में अँट नहीं रहा था और तब परशुरामजी के मुख से पहला शब्द क्या निकला ? जय रघुवंश ! सुनने वाले तो चौंक पड़े ? सर्वथा भृगुवंश की जय बोलने वाले आज रघुवंश की जय कैसे बोलने लगे ? परशुरामजी ने कहा - अब मैं समझ गया हूँ । पहले मैं समझता था कि मेरी विजय में - भृगुवंश की विजय में - ब्राह्मण की विजय में क्षत्रिय जाति की हार है । पर राम की विजय में सबकी विजय है, पराजय किसी की नहीं, यही उसकी विशेषता है । यह बड़े महत्व की बात है । जिस जीत में किसी की हार होगी, उसमें जीतने वाले को अहंकार होगा और हारने वाला बदला लेने की तैयारी करेगा
। लेकिन जिनकी जीत में सबकी जीत है, उनके लिए परशुरामजी ने नौ बार जय जय कहकर स्तुति की - आरंभ किया जय से और अन्त भी किया जय से । इस प्रकार उन्होंने नौ बार जय शब्द का प्रयोग किया । अभिप्राय यह है कि भगवान राम ने परशुरामजी से कहा था कि मैं तो आपसे हर प्रकार छोटा हूँ । मुझमें तो केवल एक गुण है और आप में तो ब्राह्मण होने के नाते नौ गुण विद्यमान हैं । इसलिए परशुरामजी ने नौ बार जय शब्द का प्रयोग करके कहा - हे राम ! ये नौ गुण मैं आपको ही अर्पित करता हूँ । अब मैंने समझ लिया कि इनका कोई महत्व नहीं और न अब इनकी आवश्यकता ही है । इस तरह परशुरामजी ने अहं के द्वारा अपने व्यक्तित्व को जो ससीम बना लिया था, वह अब असीम से मिलकर एकाकार हो गया ।

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