परशुरामजी को जब राम का प्रभाव ज्ञात हुआ, प्रेम मानो ह्रदय में अँट नहीं रहा था और तब परशुरामजी के मुख से पहला शब्द क्या निकला ? जय रघुवंश ! सुनने वाले तो चौंक पड़े ? सर्वथा भृगुवंश की जय बोलने वाले आज रघुवंश की जय कैसे बोलने लगे ? परशुरामजी ने कहा - अब मैं समझ गया हूँ । पहले मैं समझता था कि मेरी विजय में - भृगुवंश की विजय में - ब्राह्मण की विजय में क्षत्रिय जाति की हार है । पर राम की विजय में सबकी विजय है, पराजय किसी की नहीं, यही उसकी विशेषता है । यह बड़े महत्व की बात है । जिस जीत में किसी की हार होगी, उसमें जीतने वाले को अहंकार होगा और हारने वाला बदला लेने की तैयारी करेगा
। लेकिन जिनकी जीत में सबकी जीत है, उनके लिए परशुरामजी ने नौ बार जय जय कहकर स्तुति की - आरंभ किया जय से और अन्त भी किया जय से । इस प्रकार उन्होंने नौ बार जय शब्द का प्रयोग किया । अभिप्राय यह है कि भगवान राम ने परशुरामजी से कहा था कि मैं तो आपसे हर प्रकार छोटा हूँ । मुझमें तो केवल एक गुण है और आप में तो ब्राह्मण होने के नाते नौ गुण विद्यमान हैं । इसलिए परशुरामजी ने नौ बार जय शब्द का प्रयोग करके कहा - हे राम ! ये नौ गुण मैं आपको ही अर्पित करता हूँ । अब मैंने समझ लिया कि इनका कोई महत्व नहीं और न अब इनकी आवश्यकता ही है । इस तरह परशुरामजी ने अहं के द्वारा अपने व्यक्तित्व को जो ससीम बना लिया था, वह अब असीम से मिलकर एकाकार हो गया ।
। लेकिन जिनकी जीत में सबकी जीत है, उनके लिए परशुरामजी ने नौ बार जय जय कहकर स्तुति की - आरंभ किया जय से और अन्त भी किया जय से । इस प्रकार उन्होंने नौ बार जय शब्द का प्रयोग किया । अभिप्राय यह है कि भगवान राम ने परशुरामजी से कहा था कि मैं तो आपसे हर प्रकार छोटा हूँ । मुझमें तो केवल एक गुण है और आप में तो ब्राह्मण होने के नाते नौ गुण विद्यमान हैं । इसलिए परशुरामजी ने नौ बार जय शब्द का प्रयोग करके कहा - हे राम ! ये नौ गुण मैं आपको ही अर्पित करता हूँ । अब मैंने समझ लिया कि इनका कोई महत्व नहीं और न अब इनकी आवश्यकता ही है । इस तरह परशुरामजी ने अहं के द्वारा अपने व्यक्तित्व को जो ससीम बना लिया था, वह अब असीम से मिलकर एकाकार हो गया ।
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