परशुरामजी ने अपने आपको एक सीमा में बाँध लिया था, जिससे उनके जीवन में टकराहट की समस्या थी । कहाँ तो वे एक ओर साक्षात ईश्वर के अंश आवेशावतार हैं और कहाँ उन्होंने अपने आपको एक सीमा में बाँध लिया । और वह सीमा भी उनकी अपनी ही बनाई हुई है । क्षत्रिय जाति ने अन्याय किया और उन्होंने दण्ड दिया । वे कह सकते थे कि मैं क्षत्रिय जाति का कल्याण करने वाला हूँ, मैं उन्हें सही रास्ते पर ले जाने वाला हूँ । परन्तु उन्होंने ब्राह्मण के रूप में एक तीव्र संस्कार पाल लिया और भगवान राम को भी अपना परिचय देने लगे कि मैं कोई साधारण ब्राह्मण नहीं, मैं बालब्रह्मचारी हूँ और अति क्रोधी हूँ । इतना ही नहीं यह भी अच्छी तरह समझ लो कि मैं क्षत्रिय कुल का विश्वविख्यात शत्रु हूँ, उसे मिटा देने वाला हूँ और तुम दोनों क्षत्रिय हो । अगर भगवान राम भी परशुराम की तरह अपने आपको किसी जाति की सीमा लें और यह कहें कि अगर आप ब्राह्मण हैं तो मैं भी क्षत्रिय हूँ, चलिए हो जाय हमारा युद्ध । लेकिन भगवान राम के जीवन में क्या दिखाई देता है ? वहाँ न जाति की सीमा है और न संकीर्णता । वहाँ तो परिपूर्णता है । सांसारिक व्यवहार की दृष्टि से भगवान राम ने क्षत्रिय जाति में जन्म लिया था । परशुरामजी ने अब तक कई बार क्षत्रिय जाति को दण्डित किया है । भगवान राम कह सकते थे कि क्षत्रिय के रूप में मैं उसका बदला लूँगा । मैं भी आपको दण्ड दूँगा । लेकिन अगर ऐसा होता तो तो फिर एक अहं की दूसरे से टकराहट हो जाती ।
No comments:
Post a Comment