श्रीराम सबको यहाँ तक कि रावण, कुम्भकर्ण को भी राम बना देते हैं । जब कुम्भकर्ण भगवान राम के सामने आ खड़ा होता है तो देवताओं को लगता है कि बस अब इस दुष्ट का वध हुआ ही समझो, पर अगले ही क्षण जो दृश्य दिखाई दिया, उससे वे चौंक पड़े । क्या देखा, उन्होंने ? जैसे ही कुम्भकर्ण का सिर कटा, उसका तेज निकलकर भगवान श्रीराम के मुँह में समा गया । देवताओं ने चकित होकर देखा कि अब तो कुम्भकर्ण भी राम बन गया । राम से मिलकर राम हो गया । देवताओं और मुनियों को बड़ा आश्चर्य हुआ कि हम लोग महान साधना के द्वारा जिस एकत्व पर विचार करते हैं, उस एकत्व की यहाँ प्रत्यक्ष अनुभूति हो रही है । अभिप्राय यह है कि जहाँ पर अभिमान समाप्त हो जाता है वहाँ पर समत्व की - कि सब राम हैं - यही वृत्ति रह जाती है । क्योकि अभिमान के लिए दो चाहिए और दो में भी एक छोटा और एक बड़ा । अभिमान बराबरी में नहीं होता । यही परशुरामजी की वृत्ति है । उनको दो दिखाई दे रहा है और दो में भी उनकी इच्छा यह हो रही है कि हमारी बराबरी का कोई अन्य न रहे । दूसरा रहे भी तो, कोई अन्य नाम रख ले, बहुत नाम हैं । यह अहं उनकी एक समस्या है, जो सत्कर्म से घटा नहीं बल्कि बढ़ा है । उन्होंने अपने आपको एक सीमा में संकुचित कर लिया है ।
No comments:
Post a Comment