अयोध्या का सन्निपात तो शान्त हो गया, लेकिन लंका में जो सन्निपात था, वह पेट का था । उसमें कुछ पचता ही नहीं था । अब दवा ही न पचे तो लाभ कहाँ से हो । वहाँ पर सबसे बड़ी कठिनाई यही है कि बड़े-बड़े वैद्य गये और जितनी दवा दी गई, रावण को उनमें एक भी नहीं पचा । रावण को कभी पश्चाताप नहीं होता कि उसने श्रीसीताजी का हरण कर कोई भूल की है । उसे कभी इस बात पर पश्चाताप नहीं होता कि उसने अपने भाई से सोने की लंका छीनकर कोई भूल की है । उसे इस बात पर भी कभी पश्चाताप नहीं होता कि उसने विभीषण पर क्रोध करके कोई भूल की है । जब कोई अपनी भूल को स्वीकार ही नहीं करता, तब वह असाध्य सन्निपात ग्रस्त हो जाता है । लंका की समस्या यही है । और इस तरह दो नगरों के माध्यम से इन दो प्रकार के सन्निपातों को प्रस्तुत किया गया है । गोस्वामीजी ने मानो बताया कि बुराइयों के साथ हमारे अन्तर्मन में ग्लानि उत्पन्न होना, यह रोग को विनष्ट करने की सबसे पहली शर्त है ।
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