मन्थरा जान गयी थी कि सात्विक अहंकार ही कैकेयी की सबसे बड़ी दुर्बलता है । और इसी अहं को पकड़कर वह अपनी योजना में सफल भी होती हैं । कैकेयीजी कहती हैं - मन्थरा क्या तुम जानती हो कि मैं पूजा-पाठ क्यों करती हूँ ? मैं तो ब्रह्मा से एक ही वरदान माँगती हूँ - यदि ब्रह्मा मुझे अगला जन्म दें तो राम मेरा पुत्र बने और सीता मेरी बहू । अब वैसे देखिए तो यह बड़ी श्रेष्ठ भावना है । राम और सीता को पाने की भावना क्या निन्दनीय है ? राम से संबंध जोड़ने की भावना, सीता से संबंध जोड़ने की वृत्ति श्रेष्ठ तो है ही, पर उस श्रेष्ठ वृत्ति के पीछे छिपा हुआ जो एक सात्विक अहं है, उसे मन्थरा ने देख लिया । बड़ी प्रसन्न हुई वह । कोई बात नहीं, राजसिक-तामसिक न सही सात्विक अहं तो है । मन्थरा को पता कैसे चला ? अगर कोई कैकेयी से पूछ दे कि आप यह जो चाहती हैं कि अगले जन्म में राम आपका पुत्र हो, सीता आपकी बहू बने, तो आप तो स्वयं कहती हैं कि राम मुझे अपनी माता से अधिक प्रेम करते हैं, तो आप कम क्यों होना चाहती हैं ? कैकेयीजी के मन में बात यह है कि ठीक है ! राम अपनी माता से अधिक चाहते हैं, इसमें कोई सन्देह नहीं, लेकिन इतना होते हुए भी संसार में अगर पूछा जाय कि राम किसका बेटा है, तो वह कौशल्या का ही बेटा तो कहलाएगा, कैकेयी का बेटा तो कोई नहीं कहेगा । यही "मैं" है । राम को जैसे कौशल्या का बेटा कहा जाता है, उसी तरह मेरा बेटा कहा जाए, भले ही वह मुझसे प्रेम कम करे । उनके अन्तःकरण में जो राम से नाता जोड़ने की वृत्ति है, उसके मूल में यह सात्त्विक अहं है । और उसे ही पकड़कर मन्थरा ने बड़ी चतुराई से उनकी बुद्धि में विभ्रम उत्पन्न कर दिया ।
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