वस्तुतः लक्ष्मण-परशुराम संवाद की विशेषता यह है कि बाहर से चाहे जितना विनोद-भरा दिखाई दे, पर भीतर से वह उतना ही गम्भीर है । ज्ञान, भक्ति और कर्म के संदर्भ में यह प्रसंग अत्यंत गूढ़ तत्त्वों से भरा हुआ है । अगर ज्ञान की दृष्टि से देखें तो परशुरामजी का यह प्रसंग स्वरूपविस्मृति का प्रसंग है । वेदांत की मान्यता यह है कि सारा दुख अपने आपको न जानने के कारण है । वेदांत की मान्यता यह है कि व्यक्ति के अत्यंत निकट जो आनन्द का केन्द्र है, सुख का केन्द्र है, उसे न जानने के कारण ही वह दुखी है । अगर वह केन्द्र न होता और व्यक्ति उसके अभाव में दुखी होता, तब तो लगता कि सचमुच इसके जीवन में सुख का अभाव है ? पर अन्तर में सुख का कोष होते हुए भी वह दुखी है, इसका अभिप्राय क्या है ? वह अभाव के कारण दुखी नहीं, बल्कि अज्ञान के कारण दुखी है । इसे ही गोस्वामीजी विनयपत्रिका में कहते हैं कि जो अभावजन्य दुख है, वह तो वस्तु से ही दूर होगा, पर अज्ञानजन्य दुख वस्तु से नहीं, जानने से दूर होगा । गोस्वामीजी दृष्टांत देते हैं कि व्यक्ति पलंग पर सोया हुआ स्वप्न देख रहा था कि वह समुद्र में डूब रहा है और वह जोर-जोर से चिल्ला रहा है, मैं डूब रहा हूँ, बचाओ, बचाओ । सुनकर एक सज्जन कमरे से भागे । किसी ने पूछा, कहाँ जा रहे हो ? उन्होंने कहा, नाव लाने । उसने कहा, एक-दो नहीं, करोड़ों नावें लाकर भी आप उसके पलंग के चारों ओर लगा दोगे तो भी क्या लाभ ? उसे बचाने का तो एक ही उपाय है कि आप उसे जगा दें । यही वेदान्त की मान्यता है कि सारा दुख अज्ञानजन्य है, अभावजन्य नहीं । यहाँ परशुरामजी के प्रसंग में भी वेदांत की दृष्टि से बड़ी सांकेतिक बात कही गयी है । राम को ही नहीं पहचान पा रहे हैं ?
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