जब व्यक्ति रोगी होता है तो वह चिकित्सक की खोज करता है, डाक्टर या वैद्य की खोज करता है और जिस व्यक्ति को जिस पद्धति से लाभ होता है, उसका विश्वास उसी पद्धति पर होता है वह दूसरों को भी आग्रहपूर्वक यह बताता है कि इन वैद्य के द्वारा या डाक्टर के द्वारा मुझे लाभ हुआ है और आपको भी इसके द्वारा लाभ हो सकता है । तो ज्ञान मार्ग, भक्ति, कर्म या शरणागति का भी वही तात्पर्य और उद्देश्य है । ज्ञानी भी यह चाहता है कि मन के रोग दूर हों, मनुष्य की समस्याओं का समाधान हो, भक्त, कर्मयोगी और शरणागत सभी तो यही चाहते हैं । इसलिए पद्धतियों में भिन्नता होते हुए भी जिस पद्धति से जिनको लाभ होता है वह उसकी प्रशंसा करेंगे ।
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