Tuesday, 6 June 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

एक व्यक्ति ने कहीं से सुन लिया कि एक व्यक्ति हैं जो बहुत मधुर गाय का दूध बाँटते हैं, बिना मूल्य के बाँटते हैं । उसके पास मूल्य देने की शक्ति नहीं थी । वह पहुँच गया और उन सज्जन से कहा कि मैंने सुना है कि आप बिना मूल्य के दूध देते हैं तो मुझे भी दीजिए । उदार सज्जन ने उनसे कहा, ठीक है, मैं दूँगा, बर्तन लाइए । आपके हाथ में तो कोई बर्तन नहीं दिखाई देता ? उस व्यक्ति ने कहा कि दूध के साथ क्या आप बर्तन नहीं दे सकते हैं ? ऐसा करिये कि बर्तन भी आप ही दे दीजिए । मानो यही है असमर्थ की साधना । समर्थ व्यक्ति पहले साधना के द्वारा अपना निर्माण करता है और भगवान से कृपा की मांग करता है । पर गोस्वामीजी जैसा व्यक्ति कहता है कि महाराज यहाँ तो दूध ही नहीं, बर्तन भी आपको ही देना है । यहाँ पात्र बन करके मैं आपको पाऊँ इसके स्थान पर अगर पात्र की आवश्यकता है तो पात्र का निर्माण भी आपके द्वारा ही होना है ।

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