जब कोई यह प्रश्न करता है कि ' तुलसी की प्रासंगिकता क्या है ?' अथवा यह सिद्ध करने की चेष्टा करता है कि 'तुलसी आज भी प्रासंगिक हैं' तो पढ़कर हँसी आ जाती है । क्योंकि जो तुलसी की प्रासंगिकता पर प्रश्न उठाते हैं वे यह नहीं देख पाते कि उनकी स्वयं कोई प्रासंगिकता है भी या नहीं ? और तुलसीदास जी को प्रासंगिक सिद्ध करने वालों से कोई यह पूछे कि देश में कोटि-कोटि व्यक्ति जिनसे प्रेरणा प्राप्त कर रहे हैं उनकी प्रासंगिकता की घोषणा आप कर देंगे तो क्या लोग आपको धन्यवाद देंगे कि आपने तुलसी को प्रासंगिक मान लिया, बड़ी कृपा की ? गोस्वामीजी को ऐसे किसी प्रमाण-पत्र की आवश्यकता नहीं है । वस्तुतः विचार यह करना चाहिए कि पाँच सौ से अधिक वर्ष व्यतीत करने के बाद भी वे इतने प्रासंगिक क्यों हैं ?
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