Tuesday, 20 June 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

आपने एक शब्द बार-बार प्रवचनकर्ताओं, विद्वानों, संतों के मुख से सुना होगा - अन्तःकरण चतुष्टय । उनके कार्यों का बंटवारा इस रूप में किया गया कि जहाँ मनुष्य के मन में एक संकल्प विकल्प, यह ठीक कि वह ठीक, यह करें कि वह करें, ये जो नाना प्रकार के संकल्प विकल्प उठते हैं उसी का नाम मन है और जिसके द्वारा आप निर्णय करते हैं, उस निर्णय के अनुसार कार्य जिसके द्वारा संपन्न होता है, उसी का नाम बुद्धि है । अब वह जो व्यक्ति निर्णय करता है, वह निर्णय उसके संस्कार से ही जुड़ा हुआ है । ये जो संस्कार हैं, जहाँ संग्रहित हैं, जहाँ एकत्र है उसी का नाम है चित्त । बुद्धि वह है जो समझकर निर्णय देती है और चित्त वह है जो संस्कार के ही अनुकूल निर्णय देता है । उसके बाद जब आप कोई क्रिया करते हैं तो क्रिया करने के साथ, मैं ये करूँगा, मैंने ऐसा किया तो इन सबके मूल में एक शब्द आप जोड़ देते हैं 'मैं', ये अहंकार है । इस तरह से ये मन, बुद्धि, चित्त तथा अहंकार हमारे आपके अन्तःकरण में चार विभाजित रूप में विद्यमान हैं ।

No comments:

Post a Comment