Sunday, 25 June 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

ध्यान क्या है ? जब कोई व्यक्ति ध्यान करेगा तो जिसका ध्यान करता है उसके लिए शब्द है 'ध्येय' और जो करने वाला है वह है 'ध्याता' यही ध्याता, ध्यान और ध्येय जो है उसे शिखर कह दीजिए, चाहे जटा कह दीजिए या मानो त्रिवेणी कह दीजिए । प्रारंभ में आप निर्णय करेंगे मैं भगवान राम का ध्यान करूँगा । उसके पश्चात आप ध्यान करने बैठेंगे तो ध्यान की पद्धति आपको ज्ञात होगी । आपको कहाँ ध्यान करना है, ह्रदय में करना है, भ्रूमध्य में करना है और यह ध्यान की पद्धति है । यह प्रारंभ है और जब धीरे-धीरे क्रमशः इसका विकास होता है तो परिणाम की अंतिम स्थिति, वह है कि जब इन तीनों को अलग-अलग भान न रह जाए । मैं ध्यान करने वाला हूँ, मैं यह ध्यान कर रहा हूँ, यह ध्यान की पद्धति है । तीनों मिल करके यहाँ बिल्कुल एकाकार हो गये हैं वह साधक न रह करके सिद्ध हो चुका है ।

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