मानस का अभिप्राय है कि श्रीराम का चरित्र जो है राग-विराग, त्याग, श्रृंगार, शांति सभी का साकार दृश्य है । सभी श्रीराम के चरित्र में दिखाई देते हैं । भगवान राम जब वन में रहते हैं तब क्या करते हैं - ध्यान रखते हैं कि सीताजी को क्या बात सुनके प्रसन्नता होगी । लक्ष्मण को क्या सुन करके अच्छा लगेगा । भगवान राम के प्रत्येक क्रिया कलाप में उन दोनों को निरंतर प्रसन्न करने की भावना है । यही श्रीराम के चरित्र की परिपूर्णता है कि वे राज्य का परित्याग कर देते हैं, समस्त संसार के ऐश्वर्य का परित्याग कर देते हैं, पर भावना रस का परित्याग नहीं करते हैं । क्योंकि उनको लगता है कि अगर सीता मेरे लिए सब कुछ छोड़ करके वन में आती हैं तो उनको अनुभव नहीं होने देना चाहिए कि किसी वस्तु का उनके लिए अभाव है और श्रीराम ने सचमुच ऐसा ही कर दिया कि लक्ष्मण को, सीताजी को एक क्षण के लिए भी घर की याद नहीं आयी ।
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