Sunday, 4 June 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

जब भगवान शंकर पार्वतीजी को कथा सुनाते हैं तो उन्होंने कहा, पार्वती मैं तुम्हें वह कथा सुना रहा हूँ जो भुशुण्डि ने गरुड़ को सुनायी थी । माना यह जाता है कि भगवान शंकर मानस के रचियता हैं, पर वे कहते यही हैं कि यह कथा वह है जो भुशुण्डिजी ने गरुड़ को सुनायी और भुशुण्डिजी यह सुनाते हैं कि हमने भगवान शंकर से या उनके माध्यम से महर्षि लोमश के द्वारा जो कथा सुनी थी वह मैं सुना रहा हूँ और याज्ञवल्क्य जी भारद्वाज जी से कहते हैं कि यह कथा वह है जिसे शंकरजी ने पार्वतीजी को सुनाया । कैसी अनोखी बात है मौलिकता को लोग बहुत बड़ा गुणगान मानते हैं । जब कोई वस्तु नई हो तो लोग उसकी प्रशंसा करते हुए कहते हैं कि यह सर्वथा मौलिक कृति है और कृतिकार भी इस पर गर्व अनुभव करता है कि उसने कोई नई वस्तु दी है । लेकिन यहाँ तो ठीक उल्टी बात है । यहाँ तो भगवान शंकर जिन्हें हम आदि रचयिता मानते हैं, वह भी यह दावा नहीं करते कि मेरी बनायी हुई जो रामकथा है वह मैं सुना रहा हूँ । इसका तत्व रामकथा का अनादित्व, अनंतत्व है । उसका तात्पर्य यह है कि वस्तुतः व्यक्ति जब तक अपने अभिमान से, अपने कर्तव्य से मुक्त नहीं होता और यह मानता है कि उसने रामकथा की रचना की है, रामकथा को एक नया रूप, नया दर्शन दिया है तो यह उसकी धृष्टता की पराकाष्ठा है । रामकथा तो अनादि और अनन्त है और स्वाभाविक रूप से मानो वक्ता ऐसा अनुभव करता है कि स्वयं उसका इसमें कोई कर्तृत्व नहीं है, कोई पुरुषार्थ नहीं है, कोई योग्यता नहीं है ।

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