Friday, 9 June 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .....

गोस्वामीजी ने श्री रामचरितमानस ग्रंथ की रचना के प्रारंभ में जब मानसरोवर से रामकथा की तुलना की और उन्होंने कहा कि भगवान शंकर ने इसकी रचना की और मैं तो एकमात्र उसका अनुवाद ही प्रस्तुत कर रहा हूँ तो उनसे पूछा गया कि शंकरजी ने जो रचना की वो तो ठीक है, पर आपने भी इसमें कुछ किया या नहीं ? आपकी भूमिका क्या है ? तब गोस्वामीजी ने एक सूत्र दिया कि मैंने इसमें घाटों की रचना की । मानसरोवर की यात्रा जो लोग कर चुके हैं वे जानते हैं कि मानसरोवर में तो घाट नहीं है । गोस्वामीजी इस ग्रंथ की तुलना भी उसी मानसरोवर से ही करते हैं । पर मानसरोवर की यात्रा बड़ी कठिन है और मानसरोवर का दर्शन करके बस धन्यता का अनुभव करते हैं । तो इसका अभिप्राय यह है कि मानसरोवर सबके लिए सुगम नहीं है । गोस्वामीजी ने भगवान शंकर के द्वारा की गयी रचना, जो दिव्य देव वाणी में थी, उसे ग्रामीण भाषा में आज जिसे हम हिन्दी कहते हैं लिखा । तो उसका उद्देश्य यही तो था कि जैसे मानसरोवर की यात्रा अत्यंत कठिन है उसी प्रकार से भगवान शंकर ने जिस रामचरितमानस सर की रचना की वह अत्यंत दुर्गम, अत्यंत कठिन है । उस तक पहुँचना प्रत्येक व्यक्ति के लिए संभव प्रतीत नहीं हो रहा था । तो मानो उन्होंने यह चेष्टा की कि यह श्रीराम का जो दिव्य चरित्र है वह अधिक से अधिक लोगों को मिल सके और अधिकांश व्यक्ति उससे लाभान्वित हो सकें । तब उन्होंने भाषा के माध्यम से उसे सुगम बना दिया ।

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