Thursday, 29 June 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

मय दानव लंका का निर्माण करता है और रावण से इतना प्रभावित है कि वह अपनी पुत्री मन्दोदरी, रावण को अर्पित कर देता है । पर 'रामायण' में मन्दोदरी का जो चरित्र हमारे सामने आता है उसमें उनके अनेक सद्गुणों का, विवेक का वर्णन किया गया है । 'रामायण' में बार-बार यह पढ़ने को मिलता है कि वे रावण को समझाने की चेष्टा करती हैं । पर रावण का दुर्भाग्य कि वह इस पर ध्यान नहीं देता और अन्त में मारा जाता है । रावण की मृत्यु समय भी मन्दोदरी का विवेक जागृत-अवस्था में ही दिखाई देता है । वह कहती हैं कि आपने जीवन भर दूसरों को पीड़ा पहुँचाई लेकिन श्रीराम कितने उदार हैं कि उन्होंने आपको अपने धाम में स्थान दिया । मन्दोदरी की दृष्टि मानो सत्य को देखने और पहचानने में सक्षम थी । रावण की मृत्यु के पश्चात लंका के राजा के रूप में विभीषण जी का अभिषेक होता है । उस समय मन्दोदरी विभीषण की सहधर्मिणी के रूप में लंका के सिंहासन पर बैठती है । इसे लेकर कई लोगों के मन में प्रश्न उठते हैं । उन्हें लगता है कि यह तो चारित्रिक श्रेष्ठता का परिचायक नहीं है । गोस्वामीजी ने भी इस ओर संकेत किया है । पर उनकी दृष्टि में यह दोषपूर्ण कार्य न होकर मानो जीवन में एक सही दिशा में होने वाले परिवर्तन या परिमार्जन का द्योतक है ।

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