गोस्वामीजी कहते हैं कि बालि की मृत्यु के बाद तारा का सुग्रीव से तथा मन्दोदरी का विभीषण से परिणय हो जाता है । अब इसे केवल भौतिक धरातल पर देखें तो अटपटा-सा लगता है पर इसके दूसरे पक्ष पर दृष्टि डालें तो एक नया अर्थ सामने आता है । प्रत्येक समाज में अपनी-अपनी कुछ परम्पराएँ होती हैं उसे तो हम देखते हैं पर उसके पीछे जो आध्यात्मिक चिन्तन होता है, बहुधा उसकी ओर हमारी दृष्टि नहीं जाती । मन्दोदरी मन की बेटी है । मन की वृत्ति की विशेषता यह है कि उसमें हमेशा बुरे संकल्प ही नहीं आते, अच्छे विचार एवं संकल्प भी आते हैं । मन्दोदरी भले ही रावण के साथ व्याह दी गई हो एवं तारा का परिणय बालि के साथ कर दिया गया हो पर यह पक्ष तो मानो मन का बुराई के साथ जुड़ जाने का ही संकेत करता है । अब क्या यह उचित है कि मन सदैव बुराइयों से ही जुड़ा रहे ? तब तो यह एक अधूरापन ही कहलाएगा । मन में जब तक परिवर्तन होकर सद्वृत्तियाँ नहीं आ जातीं, वह अच्छाइयों से नहीं जुड़ पाता, उसकी कोई सार्थकता नहीं । इसलिए मन्दोदरी जब तक विभीषण से नहीं जुड़ जाती, तारा सुग्रीव का वरण नहीं कर लेती, तब तक उनके जीवन में पूर्णता नहीं आ सकती । निष्ठा का तात्पर्य यह नहीं है कि यदि बुराई के साथ हमारा सम्बन्ध हो जाय तो फिर सदैव हम उससे ही जुड़े रहें ।
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