गोस्वामीजी से पूछा गया - लोग इतनी कथा सुनते हैं, सत्संग में जाते हैं, सुन करके उनको लगता भी है कि हाँ ये बात तो अच्छी है ठीक है, पर ऐसा क्यों है कि उनके जीवन में उनका व्यवहार वैसा नहीं हो पाता है ? गोस्वामीजी ने इसका उत्तर यही दिया कि जैसे आपको कोई आदत लड़कपन से पड़ गयी हो और आप समझ लेते हैं कि यह आदत आपकी सही नहीं है - अब अगर कोई व्यक्ति नाखून को ही दाँत से कुतरने लगता है, तो एक बड़ा ही अभद्र दृश्य उपस्थित होता है । वह नहीं समझता है कि कोई मैं बड़ा वैज्ञानिक कार्य कर रहा हूँ, पर उसे पूछिए तो वह यही कहेगा कि क्या बतावें अनजाने में ही आदत पड़ गयी है और वह आदत मुझसे छूटती नहीं । गोस्वामीजी कहते हैं कि जब एक जन्म में जो आदत पड़ गयी वह नहीं छूटती तो इतने जन्मों की जो आदत है ? उन्होंने यही लिखा है कि यह वह चित्त है जो इतने पूर्व संस्कारों से अभ्यस्त हो चुका है कि सुन करके समझने के बाद भी उसे क्रियान्वित कर सकने में सक्षम नहीं दिखाई देता है ?
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