सतयुग जिसे सर्वश्रेष्ठ युग पुराणों में माना गया । उस युग के लिए कहा गया कि ज्ञान प्रधान युग था और सतयुग की साधना पद्धति में योग और ध्यान की प्रधानता थी और उसके माध्यम से ही व्यक्ति सत्य का साक्षात्कार करता था । ध्यान की साधना में चित्त की मुख्यता है । भक्ति की साधना में मन की मुख्यता है, कर्म की साधना में व्यक्ति के अहं की मुख्यता और असमर्थता में शरणागति की साधना विद्यमान है । इसे और स्पष्ट कर लें कि जैसे किसी रोग को नष्ट करना हो, तो नष्ट करने के लिए ऐसी दवा मिले जिससे व्यक्ति के शरीर में या मस्तिष्क में पीड़ा हो रही है उससे छुट्टी मिले पर दर्द दूर हो गया लेकिन दर्द के कारणों का पता नहीं चला तो बार-बार होगा, बार-बार वही गोलियाँ लेनी पड़ेंगी और लेने के बाद फिर अभ्यास बनेगा । अभ्यास बनने के बाद वे दवाइयाँ भी प्रभावशाली नहीं रह पातीं । इसलिए वेदान्त की यह मान्यता है, योगशास्त्र की यह मान्यता है, ज्ञान की यह मान्यता है कि जब तक अंतरंग कारण की चिकित्सा नहीं की जायेगी तब तक सही अर्थों में व्यक्ति पूरी तरह से स्वस्थ नहीं हो सकता है ।
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