एक सज्जन ने मुझसे कहा कि कथा तो आप प्रारंभ करते हैं समय से, पर लगता है कि अंत में आप थोड़ा समय का ध्यान नहीं रख पाते और कुछ अधिक बोल जाते हैं । तो मैंने यही कहा कि अपनी पत्नी से बात करते समय आप घड़ी सामने रख लेते हैं क्या ? कि जहाँ वह घड़ी की सुई आई कि बस अब प्रेम की चर्चा बंद । इसका अर्थ है जब आप रस और आनंद में डूबे हुए हैं तो आप फिर भी घड़ी को देख रहे हैं तो किस काम के । आप होंगे घड़ीदास । लेकिन वस्तुतः इसका अर्थ है रस का अपना आनन्द है, उसका अपना पक्ष है और उसका अर्थ है । श्रीराम के चरित्र में यही समन्वय है । एक ओर मर्यादा की पराकाष्ठा है, दूसरी ओर रस की पराकाष्ठा है और इसलिए भोगों के संदर्भ में भी श्रीराम के लिए कहा गया - अयोध्या में भगवान राम जब सिंहासन पर बैठते हैं तो वह बहुत सुन्दर वस्त्र पहनते हैं, आभूषण धारण करते हैं, रत्न धारण करते हैं और जब राजा के रूप में निवास करते हैं तो भोगों को भोगते हैं और गोस्वामीजी ने वह पंक्ति लिखी श्रीराम के विषय में जो श्रीराम के चरित्र की परिपूर्णता है और शब्द यही है *'श्रुति पथपालक'*।
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