Friday, 2 June 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........

प्रत्येक व्यक्ति का जो निर्माण हुआ है, उसमें एक जैसी बातें दिखाई देती हैं, पर भिन्नताएँ भी अनेक हैं और भिन्नताओं के स्वाभाविक रूप का दर्शन, आप अपने जीवन में, समाज में करते होंगे । कुछ व्यक्ति ऐसे होते हैं कि जो प्रत्येक बात को बुद्धि की कसौटी पर, तर्क की कसौटी पर कस करके देखना चाहते हैं । कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो बुद्धिमता और तर्क को बहुत महत्व नहीं देते, वे सहज विश्वास से भक्ति भावना से कथा श्रवण करते हैं और कुछ श्रोता ऐसे होते हैं जिनकी दृष्टि उपयोगिता पर होती है । कथा सुनने से क्या लाभ है या उसमें हमें क्या संदेश दिया गया क्या प्रेरणा दी गई यह एक सामाजिक दृष्टि है और एक चौथी दृष्टि ऐसी भी हो सकती है, जिसको गोस्वामीजी ने रखने की चेष्टा की । अगर कोई व्यक्ति बुद्धिवादी है, बुद्धि प्रधान है तो हम कहेंगे यह ज्ञानी है, अगर कोई भावना और ह्रदय प्रधान है तो हम कहेंगे यह भक्त है, कोई व्यक्ति अगर कर्म या सामाजिक संदर्भ से जुड़ा हुआ है, तो हम उसे कहेंगे यह कर्म धारणा से जुड़ा हुआ व्यक्ति है । गोस्वामीजी कहते हैं कि समाज में कुछ लोग ऐसे होते हैं कि जिनमें एक प्रकार की हीनता होती है, जिनमें अभाव की अनुभूति होती है और तब स्वाभाविक रूप से मानो वह संदेश देना चाहते हैं कि रामकथा ज्ञानियों के लिए भी उपादेय है, भक्तों के लिए भी परम रसमयी है, समाज सेवियों के लिए और कर्म प्रधान व्यक्तियों के लिए पुरुषार्थ की प्रेरणा देने वाली है पर, जो असमर्थ से असमर्थ व्यक्ति है उनको भी इस कथा के माध्यम से वह संदेश प्राप्त हो सकता है कि वह ऐसा अनुभव करें कि नहीं-नहीं हम भी इस जल को पी करके, इस जल को पा करके अपने जीवन में तृप्ति का अनुभव कर सकते हैं । इस तरह से मानस में चार घाटों की परिकल्पना की गई ।

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