युधिष्ठिर को 'धर्मराज' के रूप में देखा जाता है और रावण को हम पाप-वृत्ति का साकार रूप मानते हैं । पर कैसी अनोखी बात है कि चाहे कोई धर्मात्मा हो या पापी; मन दोनों के ही साथ है । और यदि 'रामायण' एवं 'महाभारत' के युद्धों के कारणों पर हम दृष्टि डालें तो इसके जो सूत्र हमारे सामने आते हैं उसके मूल में कहीं-न-कहीं यह मन का मय दानव ही कारण के रूप में विद्यमान है ।
No comments:
Post a Comment