Wednesday, 28 June 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

युधिष्ठिर को 'धर्मराज' के रूप में देखा जाता है और रावण को हम पाप-वृत्ति का साकार रूप मानते हैं । पर कैसी अनोखी बात है कि चाहे कोई धर्मात्मा हो या पापी; मन दोनों के ही साथ है । और यदि 'रामायण' एवं 'महाभारत' के युद्धों के कारणों पर हम दृष्टि डालें तो इसके जो सूत्र हमारे सामने आते हैं उसके मूल में कहीं-न-कहीं यह मन का मय दानव ही कारण के रूप में विद्यमान है ।

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