Tuesday, 27 June 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

'मानस' में एक अनोखा वर्णन आता है कि लंका के सारे भवन व महल सोने के बने हुए हैं । और इस स्वर्णमयी लंका का निर्माण करने वाला व्यक्ति 'मय' नाम का एक दानव था । और जब हम महाभारत-काल में दृष्टि डालते हैं तो एक आश्चर्यजनक बात हमारे सामने आती है कि यह 'मय' दानव वहाँ भी हमें दिखाई देता है । महाभारत-युद्ध के पूर्व की गाथा में वर्णन आता है कि प्रारंभ में जब युधिष्ठिर को राज्य दिया गया तो नये नगर के निर्माण हेतु उन्होंने उस समय 'मय' दानव को ही आमंत्रित किया । मय दानव ने एक नगर का निर्माण किया जिसमें उसने अपने अद्भुत कला-कौशल का परिचय देते हुए विभिन्न प्रासादों एवं सभा-भवनों आदि की रचना की । यह सुनकर बड़ा विचित्र-सा लगता है और एक प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है कि लंका का त्रेतायुग में निर्माण करने वाला मय दानव क्या द्वापर काल में भी विद्यमान था ? क्या उसकी इतनी लम्बी आयु थी कि वह रावण के काल से लेकर युधिष्ठिर के समय तक जीवित रहा ? यदि आध्यात्मिक दृष्टि से विचार करें तो हम कह सकते हैं कि रामायण और महाभारत काल में दिखाई देने वाला मय दानव आज भी विद्यमान है । यह मय दानव कौन है ? गोस्वामीजी विनय-पत्रिका में मय दानव का परिचय देते हुए कहते हैं कि व्यक्ति का 'मन' ही मय दानव है । इसका संकेत यही है कि 'मन' सतयुग, त्रेता, द्वापर तथा कलियुग इन चारों युगों में होता है, वह तो कभी मरता ही नहीं । यह मन रूपी मय दानव हर युग में बड़ी अनोखी-अनोखी रचनाएँ करता रहता है । जिसके पास धन आदि साधन है वे बाहर बढ़िया से बढ़िया जो निर्माण कराते हैं, ये मन की कल्पनाओं को आकार प्रदान करने की ही चेष्टाएँ हैं । पर जिनके पास साधन नहीं है क्या वे निर्माण नहीं करते ? वे भी मन-ही-मन, बैठे-बैठे न जाने कितनी रचनाएँ करते रहते हैं ? व्यक्ति बाहर निर्माण न कर पाने पर भी मनोराज्य में कल्पनाओं के द्वारा उन सबका सुख प्राप्त करने में संलग्न रहता है । यह सारा मन का ही खेल है ।

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