समाज में एक वर्ग वह है जो चरित्र की स्वच्छता, समाज में चरित्र निर्माण कैसे हो, उसी को महत्व देता है । अगर किसी समाज का चरित्र श्रेष्ठ नहीं होगा तो स्वाभाविक रूप से वह समाज पतन के गर्त में गिरेगा । तो कुछ लोगों का आग्रह चरित्र निर्माण पर है और गोस्वामीजी उनको निमंत्रण देते हुए कहते हैं कि क्या चरित्र निर्माण के लिए श्रीराम से बढ़कर अन्य कोई चरित्र सारे इतिहास में, सारे पुराणों में सारे विश्व में हुआ है कि जो इतना उज्ज्वल चरित्र का हो, जिसमें इतने गुण गण विद्यमान हों और इसके साथ-साथ उन्होंने यह कहा कि कुछ लोग ऐसे होते हैं कि वे कहते हैं चरित्र तो क्रिया की वस्तु है । पर अगर मनुष्य के अन्तर्ह्रदय में भावना नहीं है, रस नहीं है तो फिर जीवन किस कार्य का । उनकी मान्यता यह है कि जब तक लोगों के ह्रदय में रस का संचार नहीं होगा, भावना का उदरेक नहीं होगा तब तक वह निर्जीव ही रहेगा । इसका निर्माण तो भक्ति के द्वारा ही संभव है और तब भगवान राम से बढ़कर रसमय चरित्र किसका हो सकता है । श्रीराम के स्पर्श से पत्थर की नारी भी अभिचेतन हो जाती है और उसमें भी रस का संचार हो जाता है ।
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