Saturday, 17 June 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

गोस्वामीजी ने चार घाटों की जो परिकल्पना की उसका अर्थ है कि ये किसी वर्ग, सम्प्रदाय या किसी मान्यता के लिए ही नहीं, वे समान रूप से सबके लिए उपादेय हैं, कल्याणकारी हैं और यही संकेत ये जो चार वृक्ष हैं और चार वृक्षों के नीचे जो साधना है, चार वृक्ष, चार घाट, चार फल, चार भाई - ये चार अंकों का जो बाहुल्य है वे सबके बड़े निहित अर्थ वाले अंक हैं । और यहाँ पर भी आप यही पायेंगे । उसको उस रूप में आप लेंगे - पीपल के नीचे ध्यान, पाकरी के नीचे जप, आम के नीचे मानस पूजा, वट के नीचे कथा, इसका मूल उद्देश्य यही है कि हमें जीवन में जो चाहिए ध्यान के द्वारा, जप के द्वारा, मानस पूजा के द्वारा, कथा के द्वारा ये समस्त तत्व भुशुण्डि जी की साधना में विद्यमान हैं और आनन्द यही है । सम्प्रदाय और दीक्षा भी उन्होंने ली तो किसी भक्त से नहीं ली, ज्ञानी से ली । मानो संकेत यह है कि ज्ञान और भक्ति परस्पर विरोधी नहीं है और पराकाष्ठा यह है कि शंकर जी ज्ञान घाट के आचार्य होते हुए भी भुशुण्डि जी से कथा स्वयं सुनने आये ।

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