Thursday, 1 June 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

आपने प्राचीन काल के, पुराने समय के सरोवर देखे होंगे । आजकल सरोवरों की परम्परा नहीं है । जल के नये साधन हैं और नये रूप में उनका उपयोग किया जा रहा है पर आपने पुराने सरोवर जहाँ देखे होंगे, वहाँ आपने देखा होगा कि उसमें जो चारों किनारे हैं वो किस रूप में प्रस्तुत किये जाते रहे हैं । उसमें तीन ओर तो घाट होते थे, सीढ़ियाँ होती थीं और चौथी ओर सीढ़ियाँ नहीं होती थी । केवल वह सपाट बना हुआ रहता था और उसका उद्देश्य यह होता था कि तीन घाट मनुष्यों के लिए थे, चौथा घाट पशुओं के लिए, उनके उपयोग के लिए बनाया जाता था, उसको गऊ घाट कहते थे । किसी भी पशु के लिए सीढ़ी के माध्यम से जल तक पहुँचना संभव नहीं है, इसलिए उसके लिए उसे सपाट रखा जाता था । उसका मानो अभिप्राय यह है कि जैसे आप यहाँ पर कथा श्रवण करने के लिए भिन्न-भिन्न दिशाओं से आये हुए हैं । आप नगर के जिस भाग में निवास करते हैं उस भाग से यहाँ उपस्थित हैं और आप सब एक साथ कथा श्रवण कर रहे हैं । लगता तो यही है कि एक वक्ता कथा कह रहा है, पर अगर भिन्न-भिन्न श्रोताओं से यह प्रश्न किया जाय कि आपने आज कथा में क्या सुना, तो आप देख करके चकित हो जायेंगे कि उन श्रोताओं ने जो सुना होगा, उसे जिस रूप में ग्रहण किया होगा, उसमें निश्चित रूप से भिन्नता होगी । कोई व्यक्ति ऐसा होगा कि उसको एक भाग, किसी को दूसरा भाग, किसी को तीसरा या चौथा भाग प्रिय होगा ।

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