Sunday, 25 June 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

महर्षि पतंजलि ने योग की पद्धति का बड़ी विस्तृत और जटिल व्याख्या पातंजल योग दर्शन में किया है । आजकल योग शब्द बड़ा प्रिय है । बहुत से लोग में जब बात हो तो कहते हैं कि आजकल मैं योगा करता हूँ वे योग को योगा बना देते हैं । उसमें अंग्रेजी का रस थोड़ा मिल जाता है । योगा का अर्थ ठीक वही है वह जो करते हैं, वह भी योग का ही एक अंग है, पर योग की पद्धति इतनी ही नहीं है कि आसन कर लिया, प्राणायाम कर लिया । उनके द्वारा भी तो लाभ ही है पर उसका उद्देश्य क्या है ? महर्षि पतंजलि कहते हैं कि व्यक्ति को क्रमशः ध्यान के माध्यम से अपनी चित्त वृत्तियों के निरोध तक पहुंचना है । यह उनका एक लक्ष्य है, सूत्र है । अब इसको आप इस संदर्भ में विचार करके देखें । जैसे रावण के चरित्र में मिलेगा । रावण एक विशेष प्रकार का ध्यान योगी है । उसके लिए ध्यानयोगी शब्द कहना शायद उचित नहीं होगा । बहुत बड़ा ध्यान कुयोगी है । कुयोगी इसलिए है कि ध्यान की शक्ति का अगर कोई दुरुपयोग करे तो वह कुयोगी ।

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