महाभारत में महाराज शल्य ने यह निर्णय किया कि युधिष्ठिर मेरे भांजे हैं और जब महान युद्ध हो रहा है तो मेरा कर्तव्य है कि मैं उनकी सहायता करूँ और वे सेना लेकर चले । चतुर छली दुर्योधन ने सेवकों को आज्ञा दिया कि महाराज शल्य जिस मार्ग से जा रहे हैं, उस मार्ग में ऐसी सुंदर ठहरने की भोजन की, विश्राम की व्यवस्था करो जिससे वे प्रसन्न हो जायें । महाराज शल्य जहाँ जाते दुर्योधन के सेवक स्वागत करते, भोजन कराते, रात्रि विश्राम कराते, शल्य बड़े गदगद होते । पर समस्या तब आ गई कि जब उन्होंने गदगद कण्ठ से कहा कि हमारे भांजे युधिष्ठिर ने कितना सुंदर प्रबंध करा दिया, इस पर सेवकों ने कहा - क्षमा करेंगे आपके भांजे युधिष्ठिर जी ने नहीं, आपके भांजे दुर्योधन जी ने आपके लिए प्रबंध किया है और तब धर्म के अविवेक का पक्ष सामने आया । शल्य ने निर्णय किया कि शास्त्र यह कहता है कि जिसका भोजन करें जिसका अन्न ग्रहण करें उसकी ही सेवा करनी चाहिए और जब मैंने दुर्योधन का अन्न खा लिया तो दुर्योधन की ओर से ही लड़ना मेरा कर्तव्य है । भला सोचिए इससे बढ़कर मूर्खता कोई हो सकती है ? उन्होंने प्राण भी दे दिया इस धर्म का पालन करने के लिए । अब यह जो धर्म के प्रति उनकी समझ है, पालन ही नहीं किया, प्राण दे दिया क्या वह सही धर्म था ? और तब मुझे वह बात कई बार दोहरानी पड़ती है कि अगर ऐसे ही धर्मात्मा हनुमान जी होते तो रावण की वाटिका का फल खाने के बाद रावण की ओर से लड़ने का निर्णय कर लेते ? इसका अर्थ है कि धर्म के विषय में व्यक्ति का विवेक अगर सही नहीं है, तो अनर्थ हो सकता है ।
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