रामायण में चार के अंक के द्वारा बहुत कुछ कहा गया है । चार घाटों की बात भी कही गयी है, मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार उसको पवित्र करने वाली साधनाओं का भी संकेत किया गया है । इस संदर्भ में भुशुण्डि जी चार वृक्षों के नीचे चार प्रकार की साधना करते हैं । आजकल बड़ी चर्चा रहती है कि वातावरण बड़ा प्रदूषित हो गया है । वैज्ञानिक भी चिन्तित हैं कि भविष्य में क्या होगा ? वैज्ञानिकों को यह दिखाई पड़ रहा है कि सूर्य की किरणों में जो विषैले तत्व हैं उसको रोकने के लिए पृथ्वी और सूर्य के बीच एक ओजोन पर्त है जिसके द्वारा वे किरणें मनुष्य पर घातक प्रभाव नहीं डाल पाती । पर इन वर्षों में अनुभव किया गया कि उस ओजोन पर्त में छिद्र हो रहा है और चिन्तित वैज्ञानिक यह सोचने लगे हैं कि अगर इसी प्रकार से वातावरण में प्रदूषण बढ़ता गया और ओजोन पर्त कहीं नष्ट हो गयी, तब तो सारी मानव जाति का, सारी पृथ्वी का विनाश निश्चित है और तब बहुत बार आग्रह किया जाता है कि इस प्रदुषण को रोकने का उपाय क्या है ? अनेक उपाय हैं जैसे वनों का लगाना । वृक्ष काटे जा रहे हैं, उन्हें फिर से लगाया जाना चाहिए । इसका अभिप्राय है कि यह जो आज प्रदुषण है, वह भी व्यक्ति की उन्नति की देन है, विज्ञान ने इतनी उन्नति के साथ अगर बहुत सी वस्तुएँ दी हैं तो उसके भयानक परिणाम भी दिये हैं और केवल यह सत्य प्रकृति का ही नहीं है । हमारे आपके जीवन में भी जब उन्नति होती है, तो उन्नति के साथ प्रदुषण बहुत आने की संभावना रहती है । बाहर का प्रदुषण मिटे उसके लिए तो वृक्ष लगाना चाहिए, पर बाहर जो प्रदुषण है मिटे, और भीतर प्रदुषण बढ़ता जाय तो ? इसलिए भीतर भी वृक्ष लगाइए । आज की सबसे बड़ी आवश्यकता यही है कि बाहर ही नहीं, बाहर भी शुद्ध वायु हो, बाहर भी प्रदुषण मुक्त हो, लेकिन उससे भी अधिक आवश्यक है कि हमारे ह्रदय में, हमारे अन्तःकरण में प्रदुषण मिटे, दोष मिटे और प्रदुषण को मिटाने के लिए चाहे आप चार घाट की कथा सुनिए और चाहे चार वृक्ष अपने ह्रदय में लगा दीजिए और उनके नीचे जो चार प्रकार की साधनाएँ बतायी गयी उन साधनाओं के माध्यम से हमारा ह्रदय शुद्ध हो सकता है, पवित्र हो सकता है ।
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