Monday, 5 June 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

दो शब्द बड़े महत्व के हैं, बर्तन और भरना । जो बर्तन होता है वह गढ़ा जाता है और जब कोई वस्तु उसमें डाली जाती है तो 'भरना' उसको कहते हैं । एक घड़ा है, कुम्हार के द्वारा उसको गढ़ा गया अथवा किसी स्वर्णकार या किसी कारीगर के द्वारा किसी धातु का बर्तन गढ़ा गया । तो गढ़ने के पश्चात जब बर्तन बन गया, तो उसमें आप जो भी भरना चाहें - दूध, जल, अन्य कोई वस्तु या उसमें कोई वस्तु दान के रूप में भर दें । इसी प्रकार मनुष्य की साधना का उद्देश्य है - अपने आप को गढ़ना । साधना का उद्देश्य है - व्यक्ति को पात्र बनाना, व्यक्ति को योग्य बनाना । व्यक्ति का निर्माण साधना के द्वारा किया जाता है और फिर साधना के द्वारा जब कोई व्यक्ति पात्र बन जाता है तो पात्र बनने के पश्चात वह भगवान के सम्मुख निवेदन करता है कि आप अपनी कृपा के द्वारा इसको भर दीजिए, इसको सम्पूर्णता प्रदान कीजिए ।

No comments:

Post a Comment