Wednesday, 14 June 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

भगवान श्रीराम ने जब पत्थर बन गई अहिल्या को चरणों से स्पर्श कर उसमें चेतना का संचार किया, तब अहिल्या ने यही कहा कि प्रभु ! इतने वर्ष सेवा करने के बाद भी त्याग और तपस्या का जीवन व्यतीत करने के बाद भी, अगर हमारे मन में वह वृत्ति आई तो मैं यही कहूँगी कि जिस दवा के द्वारा मैं चैतन्य हो गयी हूँ, वह दवा मैं आपसे माँगती हूँ और वह मैं अपने साथ ले जाऊँगी - *पद कमल परागा रस अनुरागा* - मेरा मन भ्रमर आपके चरण कमल के दिव्य अनुराग रस का पान करता रहे मानो वह अनुराग रस देने की क्षमता महर्षि गौतम में नहीं है, जो भगवान राम में है । तब यह जो भक्ति रस का सामंजस्य है मानो यह बताने के लिए है कि हाँ, चरित्र निर्माण भी महान आवश्यक वस्तु है, पर मनुष्य के मन में रस की आवश्यकता है, मनुष्य के जीवन में भाव की आवश्यकता है और यह भक्ति का पक्ष है ।

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