बहुत से साहित्यकार, कवि और लेखक हुए हैं, पर उनकी प्रासंगिकता बहुत अल्पकालीन होती है और फिर समाप्त हो जाती है । 'इतने वर्षों के बाद भी तुलसीदासजी प्रासंगिक क्यों हैं ?' इसे यदि समझ लें तो साहित्यकार और बुद्धिजीवी भी उनसे प्रेरणा प्राप्त कर लाभान्वित हो सकते हैं । श्रीरामचरितमानस के साथ जुड़ा हुआ यह 'मानस' शब्द कई अर्थों में अभिव्यक्त होता है । इसमें तुलसी की प्रासंगिकता का भी उत्तर प्राप्त होता है । मनुष्य यद्यपि बहिरंग दृष्टि से बदलता हुआ दिखाई देता है पर मनुष्य के मन के साथ जो समस्याएँ जुड़ी हुई हैं वे प्रत्येक युग में विद्यमान दिखाई देती हैं और ये समस्याएँ भविष्य में भी रहेंगी । गोस्वामीजी ने 'मानस' की रचना 'मन' को केन्द्र में रखकर की है, अतः इस ग्रन्थ की प्रासंगिकता तो रहेगी ही ।
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