Wednesday, 7 June 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

भगवान श्रीराम का जो चरण हैं उन्हें पाने के लिए भक्त व्यग्र रहते हैं, महामुनि व्यग्र रहते हैं । मानस में एक पात्र हैं महाराज जनक और दूसरे पात्र हैं केवट । वर्ण की, बुद्धिमता और ज्ञान की दृष्टि से जनक श्रेष्ठ हैं । भगवान के चरण प्रक्षालन का सौभाग्य दोनों व्यक्तियों को मिला । इन दोनों में सर्वथा भिन्नता है । मानो जनक का प्रसंग यह बताता है कि हम पात्र बनेंगे तो भगवान को, भगवान का पद पा सकेंगे और केवट का प्रसंग यह बताता है कि उसने कोई बर्तन नहीं ढूंढा । उसने नाव में पड़ा हुआ काठ का कठौता, वह कोई चरण धुलाने के लिए नया नहीं बनवाया गया था । वह तो नित्य ही नाव में ही जल उलीचने के लिए केवट रखा करते हैं । उसने बड़ा मधुर संकेत किया । बोला, महाराज जिसके द्वारा आज तक मैं जल उलीचता था आज उसके द्वारा उसमें जल लूंगा, मैं नहीं आग्रह करता कि पात्र को आपका चरण मिलता है । मुझे तो लगता है कि आप जिसको चरण दे रहे हैं वही पात्र बन जाता है । व्यक्ति के पास क्या वस्तु है, जल भी आपका, कठौता भी आपका, नाव भी आपकी । मानो यह जो विनम्रता है केवट की इसका अभिप्राय यह है कि वस्तुतः व्यक्ति अगर यह अनुभव कर सके जैसे केवट ने अनुभव किया - जिन लोगों में विशेषता होती है, उन्हें अनुभव करना बड़ा कठिन है, पर यदि होने लगे कि प्रभु हम तो आपको रंचमात्र किसी प्रकार से प्रसन्न करने योग्य नहीं हैं, कोई गुण मुझमें नहीं है, उसे ही सौभाग्य मिलेगा ।

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