Saturday, 10 June 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

बहुधा यही दिखाई देता है कि जब किसी ग्रंथ का आप अध्ययन करें तो ग्रंथकर्ता किसी धर्म विशेष, सम्प्रदाय विशेष, मान्यता विशेष से जुड़ा हुआ होता है और वह अपने धर्म, सम्प्रदाय और मान्यता के अनुकूल ही उस ग्रंथ में प्रतिपादन करता है । और वर्णन करता है और वह ठीक है, वह भी पद्धति है । पर स्वाभाविक है कि अब ऐसी रचना एक धर्म सम्प्रदाय या विशेष वर्ग के लिए ही तो प्रेरक हो सकती है । अनेक आचार्यों ने अपनी-अपनी पद्धति से व्याख्यायें की और सभी व्याख्यायें बड़े महत्व की हैं और विभिन्न व्यक्तियों के लिए प्रेरक हैं, कल्याणकारी हैं । पर उनमें भिन्नता है । एक सम्प्रदाय से जुड़ा हुआ व्यक्ति दूसरे सम्प्रदाय की मान्यता को नहीं स्वीकार कर पाता, उसे लगता है कि यह सही नहीं है । ऐसी स्थिति में गोस्वामीजी की जो मुख्य भूमिका थी वह थी समन्वय की । और तब उन्होंने भगवान राम के चरित्र के रूप में घाटों की परिकल्पना की । उनका अभिप्राय यह है कि भगवान श्रीराम का जो चरित्र है उसमें वे सभी गुण विद्यमान हैं, जो समाज में या विश्व में व्यक्तियों को अपेक्षित लगते हैं, आवश्यक लगते हैं और उनका जो अभिष्ट है वह उन्हें प्राप्त हो सकता है ।

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