Thursday, 31 August 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

जनकपुर में धनुषयज्ञ के मण्डप में लक्ष्मणजी कुछ कहना चाहते हैं क्योंकि उनकी दृष्टि में महाराज जनकजी ने कुछ अनुचित बातें कह दी हैं । पर भगवान राम के डर के कारण वे बोल नहीं रहे हैं । नगर देखने में, सभा में बोलने में डर की बात ही नहीं, गोस्वामीजी तो यहाँ तक कहते हैं कि रात्रि के समय लक्ष्मणजी भगवान राम के चरणों की सेवा करते समय भी डरे हुए दिखाई देते हैं । रात्रि में दोनों भाइयों ने मिलकर विश्वामित्र के चरणों की सेवा की । गुरुजी उनसे बार-बार जाकर विश्राम करने के लिए कहते हैं तो फिर एक नया दृश्य सामने आता है । भगवान राम जाकर सोने लगे तो लक्ष्मणजी प्रभु के चरणों को अपनी गोद में रखकर बैठ गए और उन्हें दबाने लगे । वे सेवा कर रहे हैं पर गोस्वामीजी कहते हैं इस सेवा में प्रेम के साथ उनके मन में डर भी है । तो चरण दबाने में डर की क्या बात है ? वे तो सेवा के द्वारा प्रभु की थकान मिटा रहे हैं । फिर डरे हुए क्यों हैं ? लक्ष्मणजी को इस समय एक ही डर है कि प्रभु यह न कह दें कि बहुत रात हो गई है, जाओ सो जाओ । सेवा के प्रति लक्ष्मणजी की यह जो वृत्ति है, वह पग-पग पर आपको दृष्टिगोचर होगी । इसका मूल सूत्र यही है कि प्रेम और विश्वास के साथ जटिल समस्या यह है कि जहाँ ये दोनों होते हैं वहाँ व्यक्ति का भय छूट जाता है, संकोच छूट जाता है और तब व्यक्ति में अपने आपको नियन्त्रित करने की, अनुशासित करने की प्रवृत्ति का अभाव हो जाता है । और इसीलिए उसके द्वारा ऐसे भी कार्य हो जाते हैं जो नहीं होने चाहिए ।

Wednesday, 30 August 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

मानस में सबसे निर्भय पात्र हैं लक्ष्मणजी । भयरहित लगनेवाले लक्ष्मणजी के जीवन में पग-पग पर आपको प्रभु के प्रति डर का वर्णन मानस में प्राप्त होगा । प्रारंभ में ही यह बात आपको दिखाई देगी । विश्वामित्र के साथ दोनों भाई जनकपुर गए । वहाँ लक्ष्मणजी के मन में नगर देखने की इच्छा हुई पर वे बोल नहीं रहे हैं । क्यों नहीं बोल रहे हैं ? गोस्वामीजी कहते हैं कि उन्हें डर लग रहा है कि क्या मुझे प्रभु के सामने बोलना चाहिए । प्रभु लक्ष्मणजी के मन की बात जान लेते हैं । भय के द्वारा सुरक्षित प्रेम को वे पहचानते हैं । प्रभु बोलने में बड़े कुशल हैं । उन्होंने गुरुजी से कहा - गुरुदेव ! लक्ष्मण जनकपुर देखना चाहते हैं । - तो फिर बोल क्यों नहीं रहे हैं ? भगवान राम बड़े शीलवान हैं, अत्यंत विनम्र हैं । वे जानते हैं कि लक्ष्मणजी दोनों से डरकर नहीं बोल रहे हैं पर प्रभु यही कहते हैं कि गुरुदेव वे आपके संकोच से, डर से नहीं बोल पा रहे हैं । मानो अभिप्राय यह है कि जीव के ह्रदय में गुरु और ईश्वर के प्रति डर और संकोच होना चाहिए । भगवान से डरने की वृत्ति बने रहने से व्यक्ति जीवन में सावधान रहता है और पाप कर्मों में प्रवृत्त होने से बच जाता है ।

Tuesday, 29 August 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

गोस्वामीजी ने भगवान से प्रार्थना करते हुए कहा कि प्रभु ! तीन बातें मेरे जीवन में आ जायँ, ऐसा मैं चाहता हूँ । प्रभु ने कहा कि बताओ क्या-क्या चाहते हो । गोस्वामीजी कहते हैं - सुत की प्रीति, आप मुझे एक पिता के समान प्रीति दीजिए, मुझे अपना बेटा बना लीजिए । दूसरी बात - प्रतीति मीत की, आप एक मित्र-जैसा विश्वास दीजिए । भगवान ने कहा - और क्या चाहिए ? प्रेम और विश्वास तो तुमने माँग ही लिया । वे बोले - महाराज ! इन दोनों से ही काम नहीं चलेगा । आप मुझे तीसरी वस्तु - डर दीजिए । जैसे प्रजा को राजा से डर लगता है वैसा ही डर मुझे आपसे लगता रहे । बात बड़ी विचित्र-सी लगती है पर यह डर ही प्रेम और विश्वास का कवच है ।

Monday, 28 August 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

गोस्वामीजी जब श्यामसुंदर से प्रार्थना करते हैं कि आप वंशी छोड़कर जरा हाथों में धनुष-बाण ले लें, इसमें गोस्वामीजी का तात्पर्य था कि द्वापर युग में वंशी तो केवल ब्रजभूमि में ही बज पाई । इस कलियुग में वंशी सुनने वाले कितने लोग होंगे । आपका धनुष-बाण बहुत आवश्यक है । वंशी सदैव आपके साथ नहीं रहती पर धनुष-बाण तो सदैव साथ रहता है । वंशी केवल भक्तों के लिए है, पर धनुष-बाण तो भक्तों और अभक्तों दोनों के लिए है । यह सर्वकालिक है । इसे आपने सर्वत्र धारण किया है अतः आप कृपा कीजिए । भगवान प्रसन्न भाव से उनकी प्रार्थना स्वीकार कर लेते हैं । धनुष-बाण के प्रति गोस्वामीजी की जो धारणा है उसे वे बड़े विनोद भरे स्वर में कह देते हैं कि भगवान कृष्ण के हाथ में वंशी देखकर किसी को डर नहीं लगता पर भगवान राम के कर-कमलों में धनुष-बाण देखकर डर लगना स्वाभाविक है । किसी ने मुझसे पूछ दिया कि क्या डर लगना चाहिए ? मैंने कहा कि डर लगना चाहिए क्योंकि भगवान से जब डर लगना बन्द हो जाता है तो व्यक्ति के जीवन में, संसार में सब पाप और बुराइयाँ आ जाती हैं । भगवान से डरना अवश्य चाहिए ।

Sunday, 27 August 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

वंशी और धनुष-बाण को लेकर एक बड़ा मधुर प्रसंग आता है । गोस्वामीजी वृन्दावन गए तो, स्वाभाविक ही था, वे श्यामसुंदर भगवान कृष्ण के मन्दिर में दर्शन के लिए गए । गोस्वामीजी भगवान राम और भगवान कृष्ण में कोई अन्तर मानते ही नहीं । गोस्वामीजी ने कृष्ण गीतावली की रचना की है, जिसमें उन्होंने भगवान कृष्ण की लीलाओं का वर्णन किया है । कुछ व्यक्ति ऐसे भी होते हैं जो अनन्यता का दावा करते हुए यह सोचते हैं कि अपने इष्टदेव को छोड़कर किसी अन्य देवता को प्रणाम नहीं करना चाहिए । ऐसे एक व्यक्ति वहाँ थे जिनका नाम था परशुराम । तुलसीदासजी जाकर श्यामसुंदरजी के सामने खड़े हुए और प्रणाम करने ही जा रहे थे कि ठीक उसी समय उस व्यक्ति ने पीछे से कहा - जो अपने इष्ट को प्रणाम करता है वह तो भक्त है पर जो दूसरे के इष्ट को प्रणाम करता है वह मूर्ख है । गोस्वामीजी ठिठके । यह नहीं कि अपने आपको अनन्य सिद्ध करने के लिए वे मन्दिर से बाहर आ गए । अपितु उन्होंने श्यामसुंदर से निवेदन किया कि प्रभु ! आपकी इस शोभा के क्या कहने ! मैं आपसे एक प्रार्थना करता हूँ कि आप वंशी छोड़कर जरा हाथों में धनुष-बाण ले लें । प्रभु ने तत्काल वंशी का परित्याग कर दिया और धनुष-बाण ले लिया । इससे मानो यह भी सिद्ध हो गया कि भगवान राम और भगवान कृष्ण एक ही हैं ।

Saturday, 26 August 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

द्वापर युग में एक ब्रजभूमि को छोड़कर सर्वत्र एक ऐसा अन्धकार व्याप्त है जहाँ रामायण काल के महान भक्तों और चरित्रों के मिलने की कोई सम्भावना ही नहीं थी । वहाँ न तो श्री भरत मिलेंगे, न हनुमानजी मिलेंगे और न ही लक्ष्मणजी के सदृश्य पात्र मिलेंगे । अब इस कथन को भगवान कृष्ण की कमी के रूप में न समझ लीजिएगा । वे तो वही हैं । जो राम हैं वही कृष्ण हैं । मानो इसके द्वारा भगवान बता देते हैं कि मैं दिव्य राज्य तब बना पाऊँगा जब आपकी धारणा, आपकी भक्ति-भावना पूरी तरह से उस राज्य के अवतरण के लिए उपयुक्त हो । इसका अर्थ यह भी नहीं लेना चाहिए कि जब रामराज्य बन ही नहीं सकता तो उसके लिए प्रयास ही क्यों करें ! नहीं, नहीं रामराज्य स्थापना का संकल्प, उच्च आदर्श पर चलने की चेष्टा हम सबको तो करनी ही चाहिए और जिस दिन भी हममें से एक भी भरत बन सका, उसी दिन रामराज्य भी स्थापित हो जाएगा ।

Friday, 25 August 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .....

किसी सज्जन ने एक दिन मुझसे पूछ दिया कि वर्तमान काल में रामराज्य का निर्माण हो सकता है कि नहीं । मैंने उनसे यही कहा कि नहीं हो सकता ! क्योंकि न तो भगवान राम से पहले रामराज्य था और वही राम जब श्रीकृष्ण बनकर आए, तब भी रामराज्य नहीं बना पाए, तो अब कहाँ से बन पाएगा । आप तो बस थोड़ी देर के लिए भावराज्य में रामराज्य का आनन्द ले लीजिए । वस्तुतः यह द्वापर की जो भूमि है, उसके जो व्यक्ति हैं, वे रामराज्य या कृष्णराज्य के निर्माण में योगदान देने के योग्य हैं ही नहीं । इसका अभिप्राय है कि रामराज्य केवल भगवान नहीं बना सकते । यदि वे बना सकते तो वे हमारे ह्रदय में ही बैठे हुए हैं । अब ह्रदय में ही नहीं बना पाए तो बाहर क्या बना पायेंगे ! रामराज्य तब बनता है जब श्रीराम के साथ श्रीभरत हों, श्री हनुमान हों और श्री लक्ष्मण जैसे अन्यान्य पात्र हों ।

Thursday, 24 August 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .....

कंस अर्थात जिसके लिए जीवन ही सब कुछ है । वह देहाभिमानी है और मृत्यु न होने पाए, यही उसका अभिष्ट है । अपने पिता को कारागार में डालकर स्वयं राजा बनने से उसे कोई संकोच या लज्जा का अनुभव नहीं होता । वह कर्म का वह विकृत रूप है जो भगवान को जन्म देने वाले वासुदेव और देवकी को भी कारागार में डालकर बन्दी बना लेता है । कर्म का यह पक्ष अनगिनत व्यक्तियों के जीवन में दिखाई देता है । भगवान मथुरा के कारागार में प्रगट होते हैं तो वे वासुदेव को आदेश देते हैं कि तुम मुझे उस पार ले चलो । यह 'दूसरा पार' भाव का पक्ष है । क्रिया धर्म का पालन करते हुए व्यक्ति का ह्रदय शुद्ध हो जाता है, उसमें भक्ति भावना का उदय होता है और रस का संचार होता है । नन्द-यशोदा इसी भाव के मूर्तिमान स्वरूप हैं । यहीं पर कृष्ण का पालन होता है । यहाँ उनके द्वारा अगणित लीलाएं होती हैं । यहीं वंशी का मधुर स्वर निनादित होता है । यहाँ वंशी के रस को ग्रहण करने वाले हैं । मथुरा, द्वारिका और कुरुक्षेत्र में ऐसा कोई रसग्राही नहीं अतः वहाँ वंशी बजाना संभव नहीं ।

Wednesday, 23 August 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .....

यमुना नदी के एक ओर वृन्दावन है तथा दूसरी ओर मथुरा है । मानस में यमुना को कर्म का प्रतीक माना गया है । यमुना के एक ओर कंस का निवास है तथा दूसरे किनारे पर नन्द और यशोदा निवास करते हैं । इसका संकेत यही है कि कर्म की धारा हम सबके जीवन में प्रवाहित होती है जिसके दो किनारे हैं । व्यक्ति कर्म करते हुए कंस बन सकता है या फिर वह नन्द-यशोदा के समान बन सकता है ।

Tuesday, 22 August 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

वर्णन आता है कि सूर्यग्रहण के पर्व पर स्नान के लिए भगवान श्रीकृष्ण द्वारका से कुरुक्षेत्र पधारे । उसी पर्व पर ब्रज से भी गोप-गोपियाँ भी आए । उनके साथ शायामसुन्दरजी की परम प्रिया श्री राधारानी भी थीं । भगवान श्रीकृष्ण से उनका मिलन और एकान्त वार्तालाप भी हुआ । जब श्री राधारानी लौटकर आईं तो सखियों ने पूछा कि इतने दिनों के बाद उनसे मिलकर आपको कैसा लगा ? कितने सुख की अनुभूति हुई ? उस समय राधारानी ने कहा - सखी ! क्या बताऊँ ! कृष्ण भी वही थे और मैं भी वही राधा थी और हम दोनों का मिलन भी हुआ । किन्तु उस समय भी मेरा मन वृन्दावन के यमुना-तट पर वंशी बजाते हुए श्रीकृष्ण के ध्यान में ही डूबा हुआ था ।

Monday, 21 August 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

भगवान राम का जन्म त्रेतायुग में होता है और भगवान कृष्ण का जन्म द्वापर में होता है । काल की दृष्टि से इतनी दूरी होने पर भी हम मानते हैं कि भगवान राम और भगवान कृष्ण एक ही हैं । और दोनों में जो अन्तर है वह यह कि भगवान राम के हाथों में धनुष-बाण है और भगवान कृष्ण के हाथ में वंशी है । भगवान कृष्ण की वंशी की महिमा बड़ी अद्भुत है । ब्रज के संतों और भक्तों ने उस महिमा का गायन किया है । कवियों ने वंशी की मधुरता पर अनेकानेक पंक्तियाँ लिखी हैं । पर यह वंशी भगवान कृष्ण के हाथ में केवल ब्रजभूमि, वृन्दावन की भूमि में दिखाई देती है । भगवान कृष्ण उसके बाद मथुरा जाते हैं, द्वारका जाते हैं, कुरुक्षेत्र के युद्ध में जाते हैं, पर वहाँ कहीं भी उनके कर-कमलों में वंशी दिखाई नहीं देती । वृन्दावन की जो भावभूमि है, वह रसमय भूमि है । वहाँ वंशी से बढ़कर तो कोई और वस्तु हो ही नहीं सकती । वंशी से दिव्य अनुराग और प्रेम का ऐसा भावरस प्रवाहित होता है कि लगता है जैसे यह वंशी का रस नहीं है, मानो ब्रह्म ही अपने अधरों से वंशी को लगा कर अपनी ह्रदय की मधुरता को, प्रीति को गोपियों के अन्तःकरण में प्रविष्ट करा देते हैं । ब्रज के भक्त भगवान कृष्ण को ब्रज को छोड़कर कहीं अन्यत्र देखने की कल्पना भी नहीं कर सकते ।

Sunday, 20 August 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

भगवान राम का अवतार त्रेतायुग में हुआ और गोस्वामीजी का जन्म आज पाँच सौ वर्ष पहले हुआ । इस प्रकार भगवान राम और गोस्वामीजी के काल में एक लम्बी दूरी है । और गोस्वामीजी के काल में तथा वर्तमान समय में भले ही दो युगों का अन्तर न हो पर पाँच सौ वर्षों का एक लम्बा अन्तराल तो है ही । पर हम कहते हैं कि गोस्वामीजी और उनके द्वारा भगवान के चरित्र की जो गाथा 'रामचरितमानस' के रूप में प्रकट हुई वे दोनों आज भी प्रासंगिक हैं । इसका तो यही अर्थ है कि गोस्वामीजी ने जिन भगवान श्रीराम के चरित्र का वर्णन किया, उस चरित्र और वर्णन में मानो काल और व्यक्तित्व की दूरियाँ समाप्त हो जाती हैं ।

Saturday, 19 August 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

गोस्वामीजी के जीवन और उनकी रचनाओं पर जब मेरी दृष्टि जाती है तो उनसे मैं इतनी तादात्म्यता और अभिन्नता का अनुभव करता हूँ कि लगता है यह तो मेरे विषय में, मेरे ही विचारों की अभिव्यक्ति है । रामचरितमानस तो एक ऐसी दिव्य कृति है कि जिसके प्रति लोगों की भक्ति-भावना और आकर्षण में निरन्तर वृद्धि ही होती जा रही है । इसके अनेक कारण है और उनमें से एक कारण है कि यह केवल 'रामचरित' ही नहीं 'मानस' भी है । मानस मन को कहा जाता है । कहा जा सकता है कि काल और युग के परिवर्तन के साथ शरीर यद्यपि बदल जाता है पर मन तो बना ही रहता है । मन के लिए, कहा जा सकता है कि जो सतयुग, त्रेता और द्वापर में सत्य था, आज भी है और भविष्य में भी रहेगा ।

Friday, 18 August 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .....

मनुष्य के मन की समस्याएँ शाश्वत हैं । अनेक उपाय करने पर भी मन को विश्राम और शान्ति नहीं मिल पाती । 'विनयपत्रिका' में गोस्वामीजी अपना आत्मविश्लेषण विलक्षण ढंग से प्रस्तुत करते हैं । वे जिस दैन्य का अनुभव करते हैं उसे सहेजकर अपने अवगुणों की एक माला बनाते हैं और उसे वे प्रभु को अर्पित कर देते हैं । साथ ही उनके चरित्र और सद्गुणों की प्रभु कृपा से सुवासित एक दूसरी माला 'रामचरितमानस' के रूप में बनाकर उसे स्वयं धारण कर धन्यता का अनुभव करते हैं ।

Thursday, 17 August 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

गोस्वामीजी ने रामकथा के सन्दर्भ में कृपा और दीनता पर बहुत महत्व दिया । गोस्वामीजी बार-बार इसलिए यह कहते हैं कि उनके द्वारा जो यह मानस ग्रन्थ प्रगट हुआ वह उनके पुरुषार्थ अथवा किसी साधना का परिणाम नहीं है, वह तो प्रभु की कृपा का परिणाम है । और इसीलिए दीनता का हीनता का अनुभव करने वाले उस सन्त ने जो स्वान्तः सुखाय लिखा वह संसार के जीवों के लिए कल्याणकारी बन गया । जब उनसे पूछा गया कि इतने बड़े ग्रन्थ के निर्माण करने के बाद आपको क्या मिला ? गोस्वामीजी कहते हैं कि मैंने विश्राम की प्राप्ति की । इस प्रकार इस महानतम ग्रन्थ में एक ओर दैन्य है तो दूसरी ओर रामनाम और रामकथा के रूप में प्रभु की कृपा है । प्रभु कृपा ही इस ग्रन्थ का सर्वस्व सार है जो जीवन की दीनता को मिटा देती है ।

Wednesday, 16 August 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

मानस की विशेषताओं का अनुभव मैं अपने जीवन में निरन्तर करता ही रहता हूँ । प्रभु के चरित्र को पढ़ते हुए, प्रवचन करते हुए मुझे नित्य नये अर्थ और भाव की अनुभूति होती रहती है । कई बार लोग मेरी प्रशंसा करते हुए जब यह कहते हैं कि तुलसीदास ने भी उतना नहीं सोचा होगा जितना आप सोच और कह लेते हैं, तो मुझे बड़ा आश्चर्य होता है, यह सुनकर ! मैं उनसे पूछता हूँ कि आपने यह कैसे मान लिया कि मैं इतना सोच लेता हूँ जितना तुलसीदासजी ने नहीं सोचा ? मैं बिल्कुल नहीं सोचता और न ही सोच सकता हूँ । मेरे माध्यम से यदि ऐसी कुछ बातें रखी जाती हैं तो यह तो एकमात्र प्रभु की कृपा ही है, मेरा इसमें कोई चिन्तन नहीं है । मुझसे एक बार पूछा गया कि ईश्वर ने कभी आपकी परीक्षा ली या नहीं ? मैंने कहा - कई बार ली । फिर पूछा गया कि कितनी बार पास हुए और कितनी बार फेल हुए । मैंने बताया कि मैं तो कभी फेल ही नहीं हुआ । - अच्छा ! यह तो बड़े अभिमान की बात है कि आप ईश्वर की कड़ी परीक्षा में लगातार उत्तीर्ण होते चले गए । सचमुच मैं कभी असफल नहीं हुआ पर इसके साथ-साथ यह भी सत्य है कि अपनी योग्यता के बल पर मैं कभी पास नहीं हुआ, जब पास हुआ तो बस उनके कृपांक से ही सफल हुआ ।

Tuesday, 15 August 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .....

भगवान शंकर पार्वतीजी को कथा सुनाते समय सावधान करते हुए कहते हैं कि यह कथा सबको नहीं सुनानी चाहिए । दुष्ट और हठी व्यक्ति इस कथा को सुनने के अधिकारी नहीं हैं । भगवान शंकर ने यह नियम बना लिया था, इसलिए उनकी कथा में श्रोता के रूप में एकमात्र पार्वतीजी ही दिखाई देती हैं । कागभुशुण्डिजी की कथा भी सुमेरु पर्वत की ऊँचाइयों में ही जाकर सुनी जा सकती हैं और उसे सुनने के लिए हंसों के समान विमल विवेक वृत्ति वाला ही वहाँ पहुँच सकता है । याज्ञवल्क्यजी भी भरद्वाजजी को कथा सुनाते हैं । इस प्रकार तीनों घाटों के श्रोता सुपात्र हैं, रामकथा सुनने के अधिकारी हैं । पर गोस्वामीजी का श्रोता कौन है ? वे किसे कथा सुना रहे हैं ? गोस्वामीजी बड़ी अनोखी बात कहते हैं कि मैं  एक दुष्ट को कथा सुना रहा हूँ । - महाराज ! शंकरजी ने तो इस कथा को दुष्टों को सुनाने के लिए रोक लगा रखी है । आप किस दुष्ट को कथा सुना रहे हैं ? वे कहते हैं कि मैं अपने दुष्ट मन को कथा सुना रहा हूँ । मेरा यह दुष्ट मन रामकथा के माध्यम से धन्य हो गया । इस दिव्य रचना की यही विशेषता है कि भगवान शंकर की कथा में दुष्टों का प्रवेश वर्जित है पर गोस्वामीजी की रामकथा में वे भी प्रवेश पाकर अपने जीवन को धन्य बना सकते हैं ।

Monday, 14 August 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .....

श्रीभरत और गोस्वामीजी दोनों ही का दर्शन एक है । भरतजी के द्वारा संसार को रामप्रेम का दिव्य अमृत प्राप्त हुआ, पर वे ऐसा नहीं कहते । अपनी चित्रकूट की यात्रा के विषय में वे कहते हैं कि मैं वहाँ जाकर अपने ह्रदय की ज्वाला को शान्त करना चाहता हूँ, अपने अभाव को मिटाना चाहता हूँ । श्री भरत जी और गोस्वामीजी का स्वार्थ इसलिए श्रेष्ठ है क्योंकि वह दूसरों के स्वार्थ को नष्ट करने वाला नहीं है । वस्तुतः व्यक्ति तो स्वभाव से ही स्वार्थी होता है पर यदि वह इसे भरतजी की तरह गोस्वामीजी की तरह सही दिशा दे पाए तो यह स्वार्थ भी धन्य हो सकता है । गोस्वामीजी अपने बारे में स्वयं बताते हैं कि मेरे जीवन में इतना अभाव था कि यदि भिक्षा के चार चने कोई दे देता था तो लगता था कि मानो चार फल  (अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष) ही प्राप्त हो गए हों । और ऐसे अभाव और पीड़ा का अनुभव करने वाले तुलसीदास ने गुरुकृपा और रामनाम के आश्रय से जो प्राप्त किया उस रामनाम रूपी अमृत को मुक्त हस्त से सबको बाँट दिया ।

Sunday, 13 August 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

भगवान के 'चरणों में रति' में अर्थ का भी आनन्द है । नाम का खजाना बढ़ता जा रहा है, पर भक्त को सन्तोष नहीं होता । नाम-स्मरण में जो सुख है वह काम में कहाँ ? धर्म में सतत् सावधान रहने की आवश्यकता होती है । चूके और अधर्म बन गया । परिणाम में भय है, रस नहीं । पर यहाँ तो भगवत्प्रेम है जो धर्म का सार और सर्वस्व है । भक्त मोक्ष नहीं चाहता । ज्ञानी स्वयं मुक्त होता है पर भक्त तो भगवान को भी बन्धन में बाँध लेता है । इसलिए भक्त को लोभी कहा गया है । वन्दना-प्रसंग में गोस्वामीजी भरतजी की वन्दना करते हुए कहते हैं कि -
     *प्रनवउँ प्रथम भरत के चरना ।*
     *जासु नेम व्रत जाइ न बरना ।।*
     *राम चरन पंकज मन जासू ।*
     *बलुबुध भधुप इव तजइ न पासू ।।*

Saturday, 12 August 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

भरतजी कहते हैं कि मुझे न तो अर्थ चाहिए, न धर्म चाहिए और न ही मोक्ष चाहिए । तो फिर क्या चाहिए क्योंकि पुरुषार्थ के तो ये चार ही फल हैं ? इसका अर्थ तो यही हुआ कि कुछ भी नहीं चाहिए । श्रीभरत बड़े चतुर निकले । वे कहते हैं कि मुझे कुछ नहीं चाहिए बस प्रभु के चरणों में रति चाहिए । अब जैसे आपके घर कोई अतिथि आए और आप उसे भोजन करने के लिए कहें, पर वह अस्वीकार कर दे । फिर आप यह सोचकर कि फलाहारी होंगे, उनसे कहें कि सन्तरा ले लें । वे उसे भी नाहीं कर दें । यदि तब आप उनसे कहें कि महाराज कुछ तो लीजिए और वे कहें कि फल नहीं, फलों का रस ही दे दीजिए, तो आप यही न सोचेंगे कि ये बड़े चतुर निकले । श्रीभरत जी भी उसी तरह चारों फल के स्थान पर भगवान के चरणों में रति के रूप में वह चाहते हैं जहाँ समग्र रस एकत्रित हैं । जिस भाग का कोई महत्व नहीं है उस असार को त्यागकर वे सार को ही ग्रहण करना चाहते हैं ।

Friday, 11 August 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

गोस्वामीजी ने दृढ़ विश्वासपूर्वक ही रामनाम का आश्रय लिया और जीवन में धन्यता का अनुभव किया । इसी तरह से रामकथा की बात भी उनके ह्रदय में आई और जिसके परिणामस्वरूप रामकथा के रूप में 'मानस' का प्राकट्य हुआ । गुरु नरहरिदास बाल्मीकि रामायण से संस्कृत में कथा सुनाते थे । गोस्वामीजी को बार-बार सुनने के बाद लगा कि यह कथा तो दिव्य है । उन्होंने विचार किया कि इस कथा को मैं भाषा में बनाऊँगा । किसलिए ? क्या लोक-कल्याण के लिए ? हममें से अधिकांश व्यक्ति यही दावा करते हुए देखे जाते हैं कि हमारे जीवन का लक्ष्य एकमात्र लोककल्याण है, और वह भी निःस्वार्थ भाव से । पर गोस्वामीजी ने ऐसा कोई दावा नहीं किया । यद्यपि हम लोग कहते हैं कि गोस्वामीजी ने यह सब लोककल्याण के लिए किया पर वे तो यही कहते हैं कि बिल्कुल नहीं ! मैं तो इसे अपने लाभ की दृष्टि से भाषाबद्ध कर रहा हूँ कि जिससे और अच्छी तरह समझ सकूँ । भक्त लोग जितने अच्छे स्वार्थी होते हैं उतना स्वार्थी कोई नहीं होता । मूर्ख स्वार्थी तो बहुत होते हैं पर 'अच्छे स्वार्थी' बड़े चतुर होते हैं । वे अपने लिए सबसे अच्छी वस्तु को पाने की कामना करते हैं । संसार की छोटी-मोटी चीजों में उनकी रुचि नहीं होती ।

Thursday, 10 August 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

जब गोस्वामीजी की एक सिद्ध संत के रूप में प्रसिद्धि हो गई, और उनके नाम की सर्वत्र जयध्वनि होने लगी तो लोग उनसे आकर पूछते थे कि महाराज यह किस मंत्र जप से हुआ । गोस्वामीजी ने कहा कि यह रामनाम से हुआ - इस नाम को तो हम पहले से जानते थे, यह भी कोई बात हुई ! आप असली बात छिपा रहे हैं । गोस्वामीजी ने कहा कि नहीं, नहीं ! यदि मैंने कुछ छिपाया हो तो जीभ गलकर नष्ट हो जाय । मैंने जीवन में जो कुछ पाया, वह रामनाम के द्वारा ही पाया है । - यह रामनाम आपने किस शास्त्र से पाया ? क्या आपने वेद-पुराणों का अध्ययन करके यह निष्कर्ष निकाला ? उन्होंने कहा - वेद पुराण एवं शास्त्रों में समस्या थी कि अलग-अलग पन्थों के अलग-अलग मत थे, अलग-अलग सिद्धांत थे । सर्वत्र भ्रम और झगड़े की स्थिति थी । इसलिए गुरुजी ने मुझे जो 'रामनाम' का मन्त्र दिया था वही मेरे काम आया । गुरुजी ने कहा था कि तू रामनाम जप ! और उसी अनुभव से मैं कह सकता हूँ कि आप जो कुछ भी पाना चाहते हैं, वह रामनाम से प्राप्त कर सकते हैं । रामनाम में ऐसी दिव्य शक्ति है ।

Wednesday, 9 August 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

गोस्वामीजी ने अपने जीवन में अभाव और पीड़ा की अनुभूति की । ऐसे समय में उन्हें नरहरिदास के रूप में एक सन्त, एक गुरु का आश्रय मिला । समाज जिसे ठुकरा देता है, सन्त उसे भी स्वीकार कर लेते हैं । गुरुदेव ने उनके सिर पर अपना हाथ रखा और - रामबोला राखो नाम - उनका नाम रखा रामबोला । उन्होंने कहा - पुत्र ! स्वार्थ और परमार्थ की सिद्धि एकमात्र रामनाम से होती है । तुम रामनाम का ही आश्रय लो । गुरुजी अपने आश्रम में नित्य मायण की कथा सुनाया करते थे । गोस्वामीजी भी नित्य कथा श्रवण करते थे । अपनी रचनाओं में गोस्वामीजी ने इसका संकेत किया है । वे कहते हैं कि मैं उस गम्भीर कथा को पूरी तरह से समझ नहीं पाता था । पर मेरे गुरुदेव इतने उदार थे कि उन्होंने बार-बार कथा सुनाई, तब कुछ-कुछ समझ सका । गोस्वामीजी ने रामनाम और रामकथा दोनों को अपने जीवन में अमूल्य थाती बना लिया ।

Tuesday, 8 August 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .....

अच्छी बातों को केवल वाणी से दुहरा देना ही यथेष्ट नहीं है, हम किस स्थिति या कक्षा में हैं, यह समझना अत्यंत आवश्यक है । गोस्वामीजी ने 'मानस' के विविध पात्रों के माध्यम से यह बताने की चेष्टा की है कि यह आवश्यक नहीं कि आप हनुमान बनकर ही भगवान को पा सकें, आप सुग्रीव हैं तो अपने आपको उसी रूप में स्वीकार कर भगवान को पा सकते हैं । आप जहाँ हैं, वहीं से ईश्वर की प्राप्ति संभव है । इसलिए शास्त्रों में जहाँ यह कहा गया कि धर्म और मोक्ष फल हैं वहीं पर अर्थ और काम को भी फल के रूप में स्वीकार किया गया ।

Monday, 7 August 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

हनुमानजी प्रभु से निवेदन करते हैं कि सुग्रीव दीन हैं, अतः आप उनकी दीनता को मिटाकर उसे भयमुक्त करें । प्रभु कह सकते हैं कि हनुमान ! तुम सुग्रीव को यहाँ बुला लो ! हनुमानजी ने कहा - नहीं प्रभु ! आपको ही सुग्रीव के पास चलना होगा । हनुमानजी मानो कहना चाहते हैं कि संसार में भी रोगी यदि चलने-फिरने के योग्य हो तो वह स्वयं डाक्टर या वैद्य के पास जाता है पर यदि वह चलने में भी असमर्थ हो तो ऐसी स्थिति में वैद्य को ही रोगी के पास जाना पड़ता है । सुग्रीव की भी स्थिति यही है । वह भागते-भागते इतना थक गया है कि आपके पास आने की शक्ति उसमें नहीं है, अतः आप ही मेरी पीठ पर बैठकर उसके पास चलें । हनुमानजी ने भगवान राम और लक्ष्मणजी को अपनी पीठ पर बैठाकर सुग्रीवजी के पास पहुँचा दिया । सन्तों का कार्य ही भगवान के पास पहुँचाना है ।

Sunday, 6 August 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

गोस्वामीजी बताना चाहते हैं कि जो अपने आप में दीनता का अनुभव नहीं करते वे तो धन्य हैं, पर जो अभाव में पीड़ित हैं, दीनता जिनकी बाध्यता है, वे बेचारे क्या करें ? यदि उन्हें बताया जाय कि 'अदीनस्याम शरदंशतं' अथवा 'तुम ब्रह्म के अंशी जीव हो' तो कोई लाभ नहीं हो सकता । मात्र कह देने से किसी समस्या का समाधान नहीं हो सकता जब तक कि यह सत्य उनके अनुभव में भी न आ जाए ! इसलिए गोस्वामीजी कहते हैं कि यदि तुम दीन हो तो ऐसे दीनबन्धु की खोज करो जो तुम्हारी दीनता को मिटा सके । और ऐसे दीनबन्धु तो एकमात्र प्रभु ही हैं ।

Saturday, 5 August 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

गोस्वामीजी यदि दैन्य को इतना महत्व देते हैं तो इसलिए नहीं कि वे समाज को दीन बनाना चाहते हैं, अपितु वे चाहते हैं कि व्यक्ति अपनी दीनता समाज या संसार के सामने न प्रगट करके उसे भगवान के सामने प्रगट करे । गोस्वामीजी ने स्वयं दीनता और उसके कष्टों को भोगा था । वे जानते हैं कि दीनता संसार में स्वीकार नहीं की जाती । दीनता की सार्थकता तो दीनबन्धु के सामने उसे प्रगट करने में है । इस संबंध में आपने गोस्वामीजी का वह प्रसिद्ध दोहा सुना होगा जिसमें वे अपने विषय में कहते हैं कि -
*करमठ कठमलिया कहैं ग्यानी ग्यान बिहीन । तुलसी त्रिपथ बिहाइगो राम दुआरें दीन ।।*
- कर्मयोगियों ने मेरे गले में कण्ठी-माला देखकर कहा कि कण्ठी-मालावाला क्या जानेगा कि निष्काम कर्मयोग क्या होता है । ज्ञानियों ने मेरी आँखों में आँसू देखकर कहा कि यह तो आँसू बहानेवाला है, इसे ज्ञान नहीं हो सकता । मैंने स्वयं भक्तों के मार्ग में, उस दिशा में जाने का कोई प्रयास नहीं किया, क्योंकि मेरे भीतर भक्तों के कोई लक्षण थे ही नहीं । पूछा गया कि फिर आप प्रभु के पास कैसे पहुँच गए ? गोस्वामीजी ने कहा कि मैं ज्ञान, भक्ति, कर्म के मार्ग से नहीं, अपितु दीनता के मार्ग से प्रभु के द्वार तक पहुँच गया । गोस्वामीजी कहते हैं कि वह दीनता ही धन्य है, सार्थक है कि जो हीनता के स्थान पर दीनबन्धु की दिशा में ले जाती है ।

Friday, 4 August 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .....

भगवान राम के एक प्रिय पात्र हनुमानजी जैसे परम विरागी, सद्गुण सम्पन्न वीर और महान चरित्रवान हैं तो दूसरे प्रिय पात्र सुग्रीवजी हैं, जो कायर, भगोड़े और विषयी हैं । अब ऐसी स्थिति में स्वाभाविक रूप से यह प्रश्न सामने आता है कि ' आखिर प्रभु कौन-सी विशेषता अथवा गुण देखकर किसी को अपनाते हैं ?' इसका उत्तर हमें प्रभु और हनुमानजी के बीच जो वार्तालाप हुआ उसमें प्राप्त होता है । हनुमानजी का जब प्रभु से मिलन हुआ तो उन्होंने प्रभु से यही कहा कि महाराज ! पर्वत पर बन्दरों के राजा सुग्रीव रहते हैं जो आपके दास हैं, आप चलकर उनसे मित्रता कीजिए । प्रभु ने पूछ दिया - सुग्रीव में और भी कुछ विशेषताएँ हैं क्या ? हनुमानजी ने सुग्रीव की विशेषता के सन्दर्भ में एक बड़ा सुन्दर शब्द चुना । वे कहते हैं - हाँ महाराज ! वह सब कुछ होते हुए भी बड़ा दीन है इसलिए आप उस पर कृपा कीजिए । यह एक नई दृष्टि थी । 'दैन्यता' को ही विशेषता के रूप में प्रस्तुत करते हुए मानो हनुमानजी कहते हैं कि प्रभु ! आप योग्यता को देखकर नहीं, अयोग्यता के आधार पर अपनाएँ ! 'दैन्य' अपने आप में अवगुण है पर वही दैन्य सबसे बड़ा गुण बन जाता है जबकि वह 'दीनबन्धु' से जुड़ जाता है । हमारी दीनता यदि हमें संसार की ओर ले जाती है, तो हम और नीचे चले जाते हैं, पर यदि वह हमें ईश्वर से जोड़ देती है, तब हम धन्य हो जाते हैं ।

Thursday, 3 August 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .....

हनुमानजी के जन्म के समय से ही उनसे एक अद्भुत कथा जुड़ी हुई है । कथा आती है, श्री हनुमान जी का जन्म सायंकाल हुआ और दूसरे दिन प्रातःकाल होते-होते उन्हें बड़े जोर की भूख लग आई । उस समय उन्होंने उगते हुए लाल रंग के सूर्य को देखा । उन्हें वह एक फल प्रतीत हुआ, अतः उन्होंने आकाश में एक छलाँग लगाई और सूर्य को अपने मुँह में ले लिया । पूछा जा सकता है कि उस पर्वत के आसपास क्या फलवाले वृक्षादि नहीं थे जो उन्हें अपनी भूख मिटाने के लिए सूर्य को ही फल समझकर ग्रहण करना पड़ा । आइए, हम विचार करें कि यह कौन-सा फल है जिसे हनुमानजी पाना चाहते हैं । संसार में हम देखते हैं कि कोई व्यक्ति धन कमाने के लिए पुरुषार्थ करता है । उसके जीवन का लक्ष्य अर्थ रूपी फल को प्राप्त करना है । कोई दूसरा व्यक्ति 'काम' के बिना अपने जीवन को अधूरा मानता है । पर हनुमानजी के जीवन में 'अर्थ और काम' फल की कोई आकांक्षा नहीं है । वे सूर्य को फल समझते हैं इसके पीछे एक विशेष संकेत है । सूर्य प्रकाश-पुञ्ज हैं, प्रकाश के साक्षात देवता हैं । सूर्य ज्ञान के प्रतीक हैं । कहा जा सकता है कि हनुमानजी में तो बस 'ज्ञान' की भूख है । इसलिए उन्हें एकमात्र ज्ञान का फल ही अपनी ओर आकृष्ट करता है । ऐसा महान चरित्र है हनुमानजी का ।

Wednesday, 2 August 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .....

सुग्रीव जी के जीवन की दुर्बलताएँ पग-पग पर दिखाई देती है । वे जीवनभर भागते रहनेवाले पलायनवादी के रूप में हमारे सामने आते हैं । उनकी कायरता का एक प्रत्यक्ष दृष्टांत इस रूप में हमारे सामने आता है कि जिस समय रावण श्री सीताजी को हरण करके ले जा रहा था, उस समय वे ऋष्यमूक पर्वत के शिखर पर बैठे हुए थे । उन्होंने इस दृश्य को देखा और विलाप करती हुई श्रीसीताजी का करूण स्वर भी उन्हें सुनाई दिया । इतना ही नहीं श्री सीताजी ने उनकी ओर देखकर अपने आभूषण और वस्त्र खण्ड भी नीचे गिराए । पर सुग्रीव ने न तो रावण से लड़ने की चेष्टा की और न ही उसे चुनौती देने तक का साहस किया । रामायण में एक पात्र और हैं - गीधराज जटायु । उन्होंने श्री सीताजी का कातर स्वर जब सुना तो रावण-जैसे शक्तिशाली दुर्दांत योद्धा से वे चुनौती सहित भिड़ गये और तब तक उससे लड़ते रहे जब तक कि पंख कट जाने के कारण भूमि पर गिरकर मूर्छित नहीं हो गए । उनके चैतन्य रहने तक रावण सीताजी को अपने साथ ले जाने में सफल नहीं हो सका । गीधराज जी यद्यपि बूढ़े थे, अकेले थे पर साहसी और वीर थे और सुग्रीव जी न तो अकेले थे, न ही बूढ़े थे पर वे कायर थे । अब भगवान राम के चरित्र की विलक्षणता देखिए कि ये दोनों ही पात्र - सुग्रीवजी और जटायुजी, उनको प्रिय हैं ।

Tuesday, 1 August 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

हम देखते हैं कि व्यक्ति को पग-पग पर अर्थ की आवश्यकता होती है । अब ऐसी स्थिति में, शास्त्रों के उन उद्धरणों को सुना दिया जाय जिनमें अर्थ की निन्दा की गई है तो क्या इससे व्यक्ति की समस्या का समाधान हो जायेगा ? इससे समस्या का समाधान होने के स्थान पर उल्टे व्यक्ति के मन में एक भ्रम की स्थिति उत्पन्न होने की सम्भावना अधिक है । यही बात काम के विषय में भी कही जा सकती है । और यह संकेत 'मानस' में कई पात्रों के माध्यम से आपको मिलेगा ।