भगवान राम के एक प्रिय पात्र हनुमानजी जैसे परम विरागी, सद्गुण सम्पन्न वीर और महान चरित्रवान हैं तो दूसरे प्रिय पात्र सुग्रीवजी हैं, जो कायर, भगोड़े और विषयी हैं । अब ऐसी स्थिति में स्वाभाविक रूप से यह प्रश्न सामने आता है कि ' आखिर प्रभु कौन-सी विशेषता अथवा गुण देखकर किसी को अपनाते हैं ?' इसका उत्तर हमें प्रभु और हनुमानजी के बीच जो वार्तालाप हुआ उसमें प्राप्त होता है । हनुमानजी का जब प्रभु से मिलन हुआ तो उन्होंने प्रभु से यही कहा कि महाराज ! पर्वत पर बन्दरों के राजा सुग्रीव रहते हैं जो आपके दास हैं, आप चलकर उनसे मित्रता कीजिए । प्रभु ने पूछ दिया - सुग्रीव में और भी कुछ विशेषताएँ हैं क्या ? हनुमानजी ने सुग्रीव की विशेषता के सन्दर्भ में एक बड़ा सुन्दर शब्द चुना । वे कहते हैं - हाँ महाराज ! वह सब कुछ होते हुए भी बड़ा दीन है इसलिए आप उस पर कृपा कीजिए । यह एक नई दृष्टि थी । 'दैन्यता' को ही विशेषता के रूप में प्रस्तुत करते हुए मानो हनुमानजी कहते हैं कि प्रभु ! आप योग्यता को देखकर नहीं, अयोग्यता के आधार पर अपनाएँ ! 'दैन्य' अपने आप में अवगुण है पर वही दैन्य सबसे बड़ा गुण बन जाता है जबकि वह 'दीनबन्धु' से जुड़ जाता है । हमारी दीनता यदि हमें संसार की ओर ले जाती है, तो हम और नीचे चले जाते हैं, पर यदि वह हमें ईश्वर से जोड़ देती है, तब हम धन्य हो जाते हैं ।
No comments:
Post a Comment