गोस्वामीजी के जीवन और उनकी रचनाओं पर जब मेरी दृष्टि जाती है तो उनसे मैं इतनी तादात्म्यता और अभिन्नता का अनुभव करता हूँ कि लगता है यह तो मेरे विषय में, मेरे ही विचारों की अभिव्यक्ति है । रामचरितमानस तो एक ऐसी दिव्य कृति है कि जिसके प्रति लोगों की भक्ति-भावना और आकर्षण में निरन्तर वृद्धि ही होती जा रही है । इसके अनेक कारण है और उनमें से एक कारण है कि यह केवल 'रामचरित' ही नहीं 'मानस' भी है । मानस मन को कहा जाता है । कहा जा सकता है कि काल और युग के परिवर्तन के साथ शरीर यद्यपि बदल जाता है पर मन तो बना ही रहता है । मन के लिए, कहा जा सकता है कि जो सतयुग, त्रेता और द्वापर में सत्य था, आज भी है और भविष्य में भी रहेगा ।
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