Wednesday, 2 August 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .....

सुग्रीव जी के जीवन की दुर्बलताएँ पग-पग पर दिखाई देती है । वे जीवनभर भागते रहनेवाले पलायनवादी के रूप में हमारे सामने आते हैं । उनकी कायरता का एक प्रत्यक्ष दृष्टांत इस रूप में हमारे सामने आता है कि जिस समय रावण श्री सीताजी को हरण करके ले जा रहा था, उस समय वे ऋष्यमूक पर्वत के शिखर पर बैठे हुए थे । उन्होंने इस दृश्य को देखा और विलाप करती हुई श्रीसीताजी का करूण स्वर भी उन्हें सुनाई दिया । इतना ही नहीं श्री सीताजी ने उनकी ओर देखकर अपने आभूषण और वस्त्र खण्ड भी नीचे गिराए । पर सुग्रीव ने न तो रावण से लड़ने की चेष्टा की और न ही उसे चुनौती देने तक का साहस किया । रामायण में एक पात्र और हैं - गीधराज जटायु । उन्होंने श्री सीताजी का कातर स्वर जब सुना तो रावण-जैसे शक्तिशाली दुर्दांत योद्धा से वे चुनौती सहित भिड़ गये और तब तक उससे लड़ते रहे जब तक कि पंख कट जाने के कारण भूमि पर गिरकर मूर्छित नहीं हो गए । उनके चैतन्य रहने तक रावण सीताजी को अपने साथ ले जाने में सफल नहीं हो सका । गीधराज जी यद्यपि बूढ़े थे, अकेले थे पर साहसी और वीर थे और सुग्रीव जी न तो अकेले थे, न ही बूढ़े थे पर वे कायर थे । अब भगवान राम के चरित्र की विलक्षणता देखिए कि ये दोनों ही पात्र - सुग्रीवजी और जटायुजी, उनको प्रिय हैं ।

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