जनकपुर में धनुषयज्ञ के मण्डप में लक्ष्मणजी कुछ कहना चाहते हैं क्योंकि उनकी दृष्टि में महाराज जनकजी ने कुछ अनुचित बातें कह दी हैं । पर भगवान राम के डर के कारण वे बोल नहीं रहे हैं । नगर देखने में, सभा में बोलने में डर की बात ही नहीं, गोस्वामीजी तो यहाँ तक कहते हैं कि रात्रि के समय लक्ष्मणजी भगवान राम के चरणों की सेवा करते समय भी डरे हुए दिखाई देते हैं । रात्रि में दोनों भाइयों ने मिलकर विश्वामित्र के चरणों की सेवा की । गुरुजी उनसे बार-बार जाकर विश्राम करने के लिए कहते हैं तो फिर एक नया दृश्य सामने आता है । भगवान राम जाकर सोने लगे तो लक्ष्मणजी प्रभु के चरणों को अपनी गोद में रखकर बैठ गए और उन्हें दबाने लगे । वे सेवा कर रहे हैं पर गोस्वामीजी कहते हैं इस सेवा में प्रेम के साथ उनके मन में डर भी है । तो चरण दबाने में डर की क्या बात है ? वे तो सेवा के द्वारा प्रभु की थकान मिटा रहे हैं । फिर डरे हुए क्यों हैं ? लक्ष्मणजी को इस समय एक ही डर है कि प्रभु यह न कह दें कि बहुत रात हो गई है, जाओ सो जाओ । सेवा के प्रति लक्ष्मणजी की यह जो वृत्ति है, वह पग-पग पर आपको दृष्टिगोचर होगी । इसका मूल सूत्र यही है कि प्रेम और विश्वास के साथ जटिल समस्या यह है कि जहाँ ये दोनों होते हैं वहाँ व्यक्ति का भय छूट जाता है, संकोच छूट जाता है और तब व्यक्ति में अपने आपको नियन्त्रित करने की, अनुशासित करने की प्रवृत्ति का अभाव हो जाता है । और इसीलिए उसके द्वारा ऐसे भी कार्य हो जाते हैं जो नहीं होने चाहिए ।
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