मनुष्य के मन की समस्याएँ शाश्वत हैं । अनेक उपाय करने पर भी मन को विश्राम और शान्ति नहीं मिल पाती । 'विनयपत्रिका' में गोस्वामीजी अपना आत्मविश्लेषण विलक्षण ढंग से प्रस्तुत करते हैं । वे जिस दैन्य का अनुभव करते हैं उसे सहेजकर अपने अवगुणों की एक माला बनाते हैं और उसे वे प्रभु को अर्पित कर देते हैं । साथ ही उनके चरित्र और सद्गुणों की प्रभु कृपा से सुवासित एक दूसरी माला 'रामचरितमानस' के रूप में बनाकर उसे स्वयं धारण कर धन्यता का अनुभव करते हैं ।
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