Wednesday, 30 August 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

मानस में सबसे निर्भय पात्र हैं लक्ष्मणजी । भयरहित लगनेवाले लक्ष्मणजी के जीवन में पग-पग पर आपको प्रभु के प्रति डर का वर्णन मानस में प्राप्त होगा । प्रारंभ में ही यह बात आपको दिखाई देगी । विश्वामित्र के साथ दोनों भाई जनकपुर गए । वहाँ लक्ष्मणजी के मन में नगर देखने की इच्छा हुई पर वे बोल नहीं रहे हैं । क्यों नहीं बोल रहे हैं ? गोस्वामीजी कहते हैं कि उन्हें डर लग रहा है कि क्या मुझे प्रभु के सामने बोलना चाहिए । प्रभु लक्ष्मणजी के मन की बात जान लेते हैं । भय के द्वारा सुरक्षित प्रेम को वे पहचानते हैं । प्रभु बोलने में बड़े कुशल हैं । उन्होंने गुरुजी से कहा - गुरुदेव ! लक्ष्मण जनकपुर देखना चाहते हैं । - तो फिर बोल क्यों नहीं रहे हैं ? भगवान राम बड़े शीलवान हैं, अत्यंत विनम्र हैं । वे जानते हैं कि लक्ष्मणजी दोनों से डरकर नहीं बोल रहे हैं पर प्रभु यही कहते हैं कि गुरुदेव वे आपके संकोच से, डर से नहीं बोल पा रहे हैं । मानो अभिप्राय यह है कि जीव के ह्रदय में गुरु और ईश्वर के प्रति डर और संकोच होना चाहिए । भगवान से डरने की वृत्ति बने रहने से व्यक्ति जीवन में सावधान रहता है और पाप कर्मों में प्रवृत्त होने से बच जाता है ।

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