Sunday, 13 August 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

भगवान के 'चरणों में रति' में अर्थ का भी आनन्द है । नाम का खजाना बढ़ता जा रहा है, पर भक्त को सन्तोष नहीं होता । नाम-स्मरण में जो सुख है वह काम में कहाँ ? धर्म में सतत् सावधान रहने की आवश्यकता होती है । चूके और अधर्म बन गया । परिणाम में भय है, रस नहीं । पर यहाँ तो भगवत्प्रेम है जो धर्म का सार और सर्वस्व है । भक्त मोक्ष नहीं चाहता । ज्ञानी स्वयं मुक्त होता है पर भक्त तो भगवान को भी बन्धन में बाँध लेता है । इसलिए भक्त को लोभी कहा गया है । वन्दना-प्रसंग में गोस्वामीजी भरतजी की वन्दना करते हुए कहते हैं कि -
     *प्रनवउँ प्रथम भरत के चरना ।*
     *जासु नेम व्रत जाइ न बरना ।।*
     *राम चरन पंकज मन जासू ।*
     *बलुबुध भधुप इव तजइ न पासू ।।*

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