अच्छी बातों को केवल वाणी से दुहरा देना ही यथेष्ट नहीं है, हम किस स्थिति या कक्षा में हैं, यह समझना अत्यंत आवश्यक है । गोस्वामीजी ने 'मानस' के विविध पात्रों के माध्यम से यह बताने की चेष्टा की है कि यह आवश्यक नहीं कि आप हनुमान बनकर ही भगवान को पा सकें, आप सुग्रीव हैं तो अपने आपको उसी रूप में स्वीकार कर भगवान को पा सकते हैं । आप जहाँ हैं, वहीं से ईश्वर की प्राप्ति संभव है । इसलिए शास्त्रों में जहाँ यह कहा गया कि धर्म और मोक्ष फल हैं वहीं पर अर्थ और काम को भी फल के रूप में स्वीकार किया गया ।
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