Wednesday, 16 August 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

मानस की विशेषताओं का अनुभव मैं अपने जीवन में निरन्तर करता ही रहता हूँ । प्रभु के चरित्र को पढ़ते हुए, प्रवचन करते हुए मुझे नित्य नये अर्थ और भाव की अनुभूति होती रहती है । कई बार लोग मेरी प्रशंसा करते हुए जब यह कहते हैं कि तुलसीदास ने भी उतना नहीं सोचा होगा जितना आप सोच और कह लेते हैं, तो मुझे बड़ा आश्चर्य होता है, यह सुनकर ! मैं उनसे पूछता हूँ कि आपने यह कैसे मान लिया कि मैं इतना सोच लेता हूँ जितना तुलसीदासजी ने नहीं सोचा ? मैं बिल्कुल नहीं सोचता और न ही सोच सकता हूँ । मेरे माध्यम से यदि ऐसी कुछ बातें रखी जाती हैं तो यह तो एकमात्र प्रभु की कृपा ही है, मेरा इसमें कोई चिन्तन नहीं है । मुझसे एक बार पूछा गया कि ईश्वर ने कभी आपकी परीक्षा ली या नहीं ? मैंने कहा - कई बार ली । फिर पूछा गया कि कितनी बार पास हुए और कितनी बार फेल हुए । मैंने बताया कि मैं तो कभी फेल ही नहीं हुआ । - अच्छा ! यह तो बड़े अभिमान की बात है कि आप ईश्वर की कड़ी परीक्षा में लगातार उत्तीर्ण होते चले गए । सचमुच मैं कभी असफल नहीं हुआ पर इसके साथ-साथ यह भी सत्य है कि अपनी योग्यता के बल पर मैं कभी पास नहीं हुआ, जब पास हुआ तो बस उनके कृपांक से ही सफल हुआ ।

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