गोस्वामीजी ने रामकथा के सन्दर्भ में कृपा और दीनता पर बहुत महत्व दिया । गोस्वामीजी बार-बार इसलिए यह कहते हैं कि उनके द्वारा जो यह मानस ग्रन्थ प्रगट हुआ वह उनके पुरुषार्थ अथवा किसी साधना का परिणाम नहीं है, वह तो प्रभु की कृपा का परिणाम है । और इसीलिए दीनता का हीनता का अनुभव करने वाले उस सन्त ने जो स्वान्तः सुखाय लिखा वह संसार के जीवों के लिए कल्याणकारी बन गया । जब उनसे पूछा गया कि इतने बड़े ग्रन्थ के निर्माण करने के बाद आपको क्या मिला ? गोस्वामीजी कहते हैं कि मैंने विश्राम की प्राप्ति की । इस प्रकार इस महानतम ग्रन्थ में एक ओर दैन्य है तो दूसरी ओर रामनाम और रामकथा के रूप में प्रभु की कृपा है । प्रभु कृपा ही इस ग्रन्थ का सर्वस्व सार है जो जीवन की दीनता को मिटा देती है ।
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