श्रीभरत और गोस्वामीजी दोनों ही का दर्शन एक है । भरतजी के द्वारा संसार को रामप्रेम का दिव्य अमृत प्राप्त हुआ, पर वे ऐसा नहीं कहते । अपनी चित्रकूट की यात्रा के विषय में वे कहते हैं कि मैं वहाँ जाकर अपने ह्रदय की ज्वाला को शान्त करना चाहता हूँ, अपने अभाव को मिटाना चाहता हूँ । श्री भरत जी और गोस्वामीजी का स्वार्थ इसलिए श्रेष्ठ है क्योंकि वह दूसरों के स्वार्थ को नष्ट करने वाला नहीं है । वस्तुतः व्यक्ति तो स्वभाव से ही स्वार्थी होता है पर यदि वह इसे भरतजी की तरह गोस्वामीजी की तरह सही दिशा दे पाए तो यह स्वार्थ भी धन्य हो सकता है । गोस्वामीजी अपने बारे में स्वयं बताते हैं कि मेरे जीवन में इतना अभाव था कि यदि भिक्षा के चार चने कोई दे देता था तो लगता था कि मानो चार फल (अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष) ही प्राप्त हो गए हों । और ऐसे अभाव और पीड़ा का अनुभव करने वाले तुलसीदास ने गुरुकृपा और रामनाम के आश्रय से जो प्राप्त किया उस रामनाम रूपी अमृत को मुक्त हस्त से सबको बाँट दिया ।
No comments:
Post a Comment