Saturday, 5 August 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

गोस्वामीजी यदि दैन्य को इतना महत्व देते हैं तो इसलिए नहीं कि वे समाज को दीन बनाना चाहते हैं, अपितु वे चाहते हैं कि व्यक्ति अपनी दीनता समाज या संसार के सामने न प्रगट करके उसे भगवान के सामने प्रगट करे । गोस्वामीजी ने स्वयं दीनता और उसके कष्टों को भोगा था । वे जानते हैं कि दीनता संसार में स्वीकार नहीं की जाती । दीनता की सार्थकता तो दीनबन्धु के सामने उसे प्रगट करने में है । इस संबंध में आपने गोस्वामीजी का वह प्रसिद्ध दोहा सुना होगा जिसमें वे अपने विषय में कहते हैं कि -
*करमठ कठमलिया कहैं ग्यानी ग्यान बिहीन । तुलसी त्रिपथ बिहाइगो राम दुआरें दीन ।।*
- कर्मयोगियों ने मेरे गले में कण्ठी-माला देखकर कहा कि कण्ठी-मालावाला क्या जानेगा कि निष्काम कर्मयोग क्या होता है । ज्ञानियों ने मेरी आँखों में आँसू देखकर कहा कि यह तो आँसू बहानेवाला है, इसे ज्ञान नहीं हो सकता । मैंने स्वयं भक्तों के मार्ग में, उस दिशा में जाने का कोई प्रयास नहीं किया, क्योंकि मेरे भीतर भक्तों के कोई लक्षण थे ही नहीं । पूछा गया कि फिर आप प्रभु के पास कैसे पहुँच गए ? गोस्वामीजी ने कहा कि मैं ज्ञान, भक्ति, कर्म के मार्ग से नहीं, अपितु दीनता के मार्ग से प्रभु के द्वार तक पहुँच गया । गोस्वामीजी कहते हैं कि वह दीनता ही धन्य है, सार्थक है कि जो हीनता के स्थान पर दीनबन्धु की दिशा में ले जाती है ।

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