Sunday, 6 August 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

गोस्वामीजी बताना चाहते हैं कि जो अपने आप में दीनता का अनुभव नहीं करते वे तो धन्य हैं, पर जो अभाव में पीड़ित हैं, दीनता जिनकी बाध्यता है, वे बेचारे क्या करें ? यदि उन्हें बताया जाय कि 'अदीनस्याम शरदंशतं' अथवा 'तुम ब्रह्म के अंशी जीव हो' तो कोई लाभ नहीं हो सकता । मात्र कह देने से किसी समस्या का समाधान नहीं हो सकता जब तक कि यह सत्य उनके अनुभव में भी न आ जाए ! इसलिए गोस्वामीजी कहते हैं कि यदि तुम दीन हो तो ऐसे दीनबन्धु की खोज करो जो तुम्हारी दीनता को मिटा सके । और ऐसे दीनबन्धु तो एकमात्र प्रभु ही हैं ।

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